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रामविलास पासवान : अपनी क्षमता व संभावनाओं से कम हासिल करने वाला राजनेता

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राहुल सिंह

रामविलास पासवान (Ramvilas Paswan) नहीं रहे.  लंबी बीमारी के बाद आठ अक्तूबर 2020 को 74 वर्षीय पासवान का निधन हो गया. अपने करीब 50 साल के राजनैतिक सफर के मध्यावस्था में वे देश में दलित राजनीति के सबसे चमकदार चेहरे रहे. लेकिन, राजनीति के उत्तरार्द्ध में वे देश व प्रदेश की बड़ी राजनैतिक पार्टियों के लिए सीटों की संख्या में इजाफा कराने के लिए मार्जिन वोट ट्रांसफर करवाने वाले नेता बन गए. नहीं तो क्या भाजपा को नीतीश और पासवान में एक को चुनना होता तो वह पासवान को ही नहीं चुन लेती? जब उनकी राजनीति चरम से ढलान पर उतरनी शुरू हुई थी तो भी पासवान अपने संबोधन में यह संकेत देते थे कि वे बहुत पहले बिहार के मुख्यमंत्री बन सकते थे और एक दलित और समाजवादी चेहरा होने के कारण वे पीएम मैटेरियल भी हैं.

निश्चित रूप से समाजवाद की सबसे उर्वर भूमि बिहार के अपने समकालीन नेताओं में रामविलास पासवान (Ramvilas Paswan) सबसे वरिष्ठ और व्यापक संसदीय अनुभव वाले नेता थे.  वे एक शानदार वक्ता और अपने क्षेत्र के लिए कुछ भी कर गुजरने वाले नेता थे। लड़कपन से मैं उनके संसदीय क्षेत्र हाजीपुर के लोगों से उनकी अथक तारीफ सुनता रहा हूं और निश्चित रूप से उन्होंने अपने क्षेत्र के लिए जितना कुछ किया, उतना बिहार ही नहीं देश में भी बहुत कम जनप्रतिनिधि कर पाए होंगे. लेकिन, इन सब चीजों ने चाहे-अनचाहे उनके लिए एक दायरा भी बनाया कि उनका फोकस अपने इलाके तक है, जबकि वे सूबे और देश के बड़े नेता हैं तो उनसे उम्मीदों का दायरा भी उतना ही फैला हुआ है.


रामविलास पासवान को श्रद्धा सुमन अर्पित करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

डीएसपी के लिए चुने गए रामविलास पासवान के समाजवाद में लालू प्रसाद यादव वाला भदेसपन कभी नहीं रहा और न ही इंजीनियर से सोशल इंजीनियर बने नीतीश कुमार वाला देशजपन. सिर्फ इसमें उनका बिहारी टोन एक अपवाद था. उनके समाजवाद में एक वैभव था, एक नफासत थी. लालू-नीतीश से लेकर सुशील मोदी तक के कुर्ता पायजामा से इतर पासवान की सूट-बूट उनकी एक विशिष्ट पहचान बनाता था. कहिए न कहिए, राजनीति में इसके मायने होते हैं और अबोले भी दिमाग पर असर डालते हैं. संभवतः ऐसा इस कारण भी रहा हो कि पासवान साहेब की नौकरी छोड़ कर नेता बने थे और लालू-नीतीश-सुमो छात्र राजनीति की पाठशाला से मुख्यधारा की राजनीति में आए. लड़ते-झगड़ते, गिरते-बजड़ते, संघर्ष करते.

लालू विरोध का शून्य

90 के दशक के शुरुआती सालों में लालू प्रसाद, जब विराट लालू प्रसाद और फिर आक्रामक लालू प्रसाद की छवि बना रहे थे तो उस समय बिहार की राजनीति में वैकल्पिक शून्य था. उस शून्य को भरने के लिए उस वक्त पासवान सबसे मजबूत दावेदार हो सकते थे, लेकिन वह मौका युवा नीतीश कुमार ने झपट लिया, यह कह कर कि बिहार में खूंटा गाड़ कर राजनीति करूंगा. हालांकि इस बयान के बावजूद नीतीश केंद्र की सरकार में शामिल हुए, लेकिन उन्होंने लालू की खिलाफत को अपनी ताकत बना लिया और उनका राजनैतिक कद बढता गया. हालांकि नीतीश राजनीति में लालू और पासवान से जूनियर थे और 94-95 में लालू, पासवान या शरद यादव के इतने प्रभावी राजनैतिक चेहरे भी नहीं थे.

रामविलास पासवान ने अपने राजनैतिक जीवन के पूर्वार्द्ध में राष्ट्रीय स्वीकृति के लिए (संभवतः) बिहार के बाहर चुनाव लड़ा जिसने उनके कद को बड़ा बनाया. निश्चित रूप से वे देश के वरिष्ठ समाजवादी व दलित नेताओं में गिने जाते थे और गिने जाते रहेंगे, लेकिन राजनीति में मौसमविज्ञानी कहलाना उनकी उपलब्धि नहीं मानी जा सकती है. लालू प्रसाद यादव ने उन्हें व्यंग में यह नाम दिया और इसने पहले से सीमित हो रही उनकी राजनैतिक संभावनाओं को और सीमित किया. तीन दशकों में अधिकतर केंद्रीय सरकारों का हिस्सा बनने के पासवान के फैसले ने भी उनके लिए सीमाएं तय की कि वे स्टैंड लेने वाले व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि सत्ता के साथ सहजता से जाने वाले शख्स हैं. परिवार जनों व रिश्तेदारों को दिल खोल कर चुनावी टिकट देने से भले उनके परिवार को सत्ता सुख हासिल हुआ हो लेकिन इससे उन्हें राजनैतिक नुकसान ही हुआ.


रामविलास पासवान व लालू प्रसाद यादव का एक खुशनुमा पल.

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पासवान की 2005 वाली चूक

पासवान ने अपने राजनैतिक जीवन में सबसे बड़ी चूक फरवरी 2005 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के बाद के राजनैतिक परिदृश्य में फैसला लेने में कर दी. उस चुनाव में उन्हें 29 सीटें मिली थीं और वे लालू खेमे या नीतीश की अगुवाई वाले एनडीए खेमे किसी की भी सरकार गठन कराने के लिए जरूरी थे. लेकिन, पासवान कई दिनों तक मीडिया में यह कहते रहे कि सत्ता की चाभी तो मेरे पास है. वे खुद को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते थे. आखिरकार कोई सरकार नहीं बनी और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा. उसी साल नवंबर में फिर चुनाव हुआ और पासवान की पार्टी 203 सीटों पर लड कर 29 से 10 सीटों पर आ गिरी और नीतीश कुमार के अगुवाई वाले गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ. यहां से बिहार की राजनीति लालू युग से नीतीश युग में प्रवेश कर गयी, जो अबतक जारी है. बिहार की राजनीति में कभी पासवान युग आया ही नहीं और लालू और नीतीश राज्य की राजनीति के दो ध्रुव बन गए.

संभवतः उस दौर में पासवान ने अगर किसी के पक्ष में व्यावहारिक निर्णय लिया होता तो उनकी छवि अधिक जिम्मेवार नेता की होती, लेकिन राज्य में राजनैतिक अनिश्चिता बनने से लालू के खिलाफ खुद को लगातार प्रोजेक्ट कर रहे नीतीश की छवि और निखर गयी. तब के तीन शिखर एनडीए नेताओं वाजपेयी, आडवाणी व जार्ज के भी नीतीश प्रिय थे.


एक कार्यक्रम में नीतीश कुमार व रामविलास पासवान.

चिराग के फैसले

बहरहाल, सीनियर पासवान बीते कुछ सालों से लगातार पार्टी की बागडोर धीरे-धीरे अपने पुत्र चिराग पासवान को ट्रांसफर करते जा रहे थे. चिराग ने बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश की अगुवाई में चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया और नरेंद्र मोदी को अपना नेता माना. चिराग को यह मालूम है कि उनका न तो मोदी से मुकाबला है और न ही उनकी पार्टी का भाजपा से, अगर मुकाबला होना भी है तो राजद व जदयू से.

चिराग का यह फैसला अधिक परिपक्व नजर आता है कि उन्होंने नीतीश के नेतृत्व से बाहर अपनी पहचान बनाने की सोची. नहीं तो तीसरी पार्टी की हैसियत के साथ गठबंधन में रहना उनके लिए अधिक आसान व फौरी तौर पर लाभकारी हो सकता था.

संभवतः चिराग पासवान इस बात को मान व समझ रहे हैं कि कोई व्यक्ति अपने दौर के सबसे ताकतवर शख्स के खिलाफ खड़ा होकर ही अपनी पहचान बना सकता है, शरणागत होना तो सबसे आसान राह है. नीतीश की राजनैतिक ताकत देश की राजनीति में मोदी युग के आगमन के बाद कम हुई लेकिन निश्चित रूप से आज भी वे बिहार की राजनीति के सबसे प्रभावी चेहरे हैं, ऐसे में लोगों से कनेक्ट होने में माहिर जूनियर पासवान ने जुदा राह चुन कर एक अपनी संभावनाओं व क्षमता से कम हासिल न करने का रिस्क ले लिया है.

चिराग पासवान.

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