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Opinion: ढाका का बदलता मौसम, पूर्वोत्तर भारत की नई चुनौती: डॉ. अतुल मलिकराम 

Opinion: ढाका का बदलता मौसम, पूर्वोत्तर भारत की नई चुनौती: डॉ. अतुल मलिकराम  भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल दो पड़ोसी देशों की कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका सीधा असर भारत के पूर्वोत्तर की सुरक्षा, व्यापार, कनेक्टिविटी और विकास पर पड़ता है। डॉ. अतुल मलिकराम अपने लेख में शेख हसीना सरकार के दौर में दोनों देशों के बीच बढ़े सुरक्षा सहयोग, भूमि सीमा समझौते, कनेक्टिविटी परियोजनाओं और आर्थिक साझेदारी का उल्लेख करते हुए 2024 के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों का विश्लेषण करते हैं।
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Opinion: अपने समय से आंखें चुराना सबसे बड़ी मक्कारी है, यह ईमानदार साहित्यकारिता से भी गद्दारी है

Opinion: अपने समय से आंखें चुराना सबसे बड़ी मक्कारी है, यह ईमानदार साहित्यकारिता से भी गद्दारी है अपने समय की सामाजिक समस्याओं से आंखें चुराना क्या साहित्य और मानवीयता के प्रति ईमानदारी हो सकती है? राजीव थेपड़ा के इस विचार लेख में इसी मूल सवाल के माध्यम से समाज में बढ़ती वैचारिक कटुता, अहंकार, संवादहीनता और आपसी अविश्वास पर गंभीर विमर्श किया गया है। लेख में कहा गया है कि किसी भी समस्या का समाधान स्वस्थ संवाद, आत्ममंथन और सभी पक्षों के प्रति सदाशयता से ही संभव है।
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Opinion: निजता का प्रश्न और भ्रम में हम!

Opinion: निजता का प्रश्न और भ्रम में हम! निजता आज के दौर में एक महत्वपूर्ण सामाजिक और बौद्धिक प्रश्न बन चुकी है। राजीव थेपड़ा अपने विचार लेख में निजता, सामाजिक संबंधों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और तकनीक के बदलते प्रभाव को लेकर कई सवाल उठाते हैं।
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आदिवासी समाज और उसकी सामाजिक, राजनीतिक चेतना 

आदिवासी समाज और उसकी सामाजिक, राजनीतिक चेतना  यह आलेख झारखंड के परिप्रेक्ष्य में आदिवासी समाज की बढ़ती सामाजिक-राजनीतिक चेतना, उनके अधिकारों और सामूहिकता पर मंडराते खतरों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें विस्थापन, बाजारवादी शक्तियों के प्रभाव और राजनीतिक सौदेबाजी के खिलाफ आदिवासी पहचान, स्वशासन तथा जल-जंगल-जमीन के ऐतिहासिक संरक्षण संघर्ष को रेखांकित किया गया है।
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तकनीक और परंपरा के समन्वय से संभव है आदिवासी सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सपना

तकनीक और परंपरा के समन्वय से संभव है आदिवासी सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सपना आशुतोष प्रसाद द्वारा लिखित यह आलेख झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति पर आधुनिकता और तकनीक के प्रभाव का व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह दर्शाता है कि कैसे नई पीढ़ी तकनीक और शिक्षा के सही प्रयोग तथा मातृभाषा के संरक्षण के माध्यम से अपनी परंपराओं को वैश्विक पहचान दिला सकती है।
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2047 में कांग्रेस: विरासत बचेगी या बिखरेगी? डॉ. अतुल मलिकराम का राजनीतिक विश्लेषण

2047 में कांग्रेस: विरासत बचेगी या बिखरेगी? डॉ. अतुल मलिकराम का राजनीतिक विश्लेषण भारत की आजादी की शताब्दी वर्ष 2047 तक कांग्रेस का राजनीतिक भविष्य कैसा होगा, यह बड़ा सवाल है। राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. अतुल मलिकराम ने अपने लेख में कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका, वर्तमान चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं का विश्लेषण किया है।
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विश्व आदिवासी दिवस विशेष: बदलते झारखंड में आदिवासी समाज, संस्कृति से विकास की नई राह तक

विश्व आदिवासी दिवस विशेष: बदलते झारखंड में आदिवासी समाज, संस्कृति से विकास की नई राह तक विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर प्रस्तुत यह विशेष लेख झारखंड के आदिवासी समाज में तेजी से हो रहे सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बदलावों का विश्लेषण करता है। लेख में शिक्षा, रोजगार, तकनीक, मातृभाषा, महिलाओं की भागीदारी, पलायन, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई है।
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Opinion: सनातन और हिन्दुओं की आस्था से खिलवाड़ का खतरनाक सिलसिला

Opinion: सनातन और हिन्दुओं की आस्था से खिलवाड़ का खतरनाक सिलसिला वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार के इस विचार लेख में राम मंदिर दानपात्र विवाद, संसद परिसर में हुए विरोध प्रदर्शन और सनातन पर हो रही राजनीतिक बहस का विश्लेषण किया गया है। लेखक का दावा है कि कुछ राजनीतिक घटनाक्रमों के जरिए हिंदू आस्था और संत परंपरा को निशाना बनाया जा रहा है।
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पॉलीमर नोटों की ओर बढ़ता भारत, सुरक्षित और टिकाऊ मुद्रा की नई शुरुआत

पॉलीमर नोटों की ओर बढ़ता भारत, सुरक्षित और टिकाऊ मुद्रा की नई शुरुआत भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मुद्रा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल करते हुए 10 और 20 रुपये के पॉलीमर (प्लास्टिक आधारित) नोटों के बड़े पैमाने पर फील्ड ट्रायल की तैयारी शुरू की है।
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हर दिल में बसने वाले नायक: जेआरडी टाटा की मानवीय विरासत आज भी प्रेरणास्रोत

हर दिल में बसने वाले नायक: जेआरडी टाटा की मानवीय विरासत आज भी प्रेरणास्रोत जेआरडी टाटा केवल एक सफल उद्योगपति नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों, नैतिक नेतृत्व और राष्ट्र निर्माण के प्रतीक थे। उन्होंने कर्मचारियों के सम्मान, नवाचार, सामाजिक उत्तरदायित्व और उत्कृष्ट कार्यसंस्कृति को हमेशा प्राथमिकता दी।
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हरमू नदी की दर्दभरी कहानी: कभी जीवनदायिनी, आज गंदे नाले में तब्दील

हरमू नदी की दर्दभरी कहानी: कभी जीवनदायिनी, आज गंदे नाले में तब्दील रांची की ऐतिहासिक हरमू नदी पर आधारित इस विचारोत्तेजक लेख में लेखक अरविंद शर्मा ने नदी की बदहाल स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। कभी स्वच्छ जल, बाढ़ और सामाजिक जीवन का केंद्र रही हरमू आज गंदे नाले में बदल चुकी है।
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