ब्लॉग : आदिवासियों के अधिकार और अस्मिता के अनुत्तरित अध्याय

रमेश शर्मा

तब जाहिरा तर्क था कि पश्चिमी क्षेत्रों में अमरीकी साम्राज्य का विस्तार किया जा सके। तत्कालीन राष्ट्रपति एंड्रू जैक्सन ने स्वेच्छा से विस्थापन स्वीकार करने वालों को इमदाद के रूप में सुदूर मैदानों मे ज़मीन देने का वायदा किया। लेकिन जिन ‘इंडियन’ ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार किया ऐसे हजारों लोगों के अस्तित्व और अधिकार हमेशा के लिये नेस्तनाबूद कर दिये गये। अमरीकी साम्राज्य द्वारा लाखों हेक्टेयर भूमि, अमरीकियों के विकास और समृद्धि के नाम हड़प लिया गया। वर्ष 1840 के बाद इन्ही क्षेत्रों में कपास की खेती शुरू हुई और गुलामों की नई बस्तियां बसाई गयी।
ठीक 160 बरसों के बाद मार्च 1980 में इस क़ानून को वापस लेने की घोषणा की गयी। फिर लगभग 12 बरसों के बाद 1993 में जॉर्जिया जनरल असेंबली में केयरो आदिवासियों को सरकार द्वारा यह (तथाकथित) राजनैतिक तोहफ़ा दिया गया कि वो अपने मूल भूमि में भ्रमण करने के लिये नियमानुसार अनुमति प्राप्त करके आ तो सकते हैं, लेकिन जब तक यह क़ानून पूरी तरह से वापस नहीं लिया जाता उन्हें यहाँ वैधानिक रूप से ‘बसने’ का अधिकार नहीं होगा।
यह महज संयोग नहीं है कि अमरीका के मिसिसिपी के तटों के ‘इंडियन’ से सुदूर भारत के पूर्वी गोलार्ध में रहने वाले ‘आदिवासियों’ की जिंदगी के कथानक और कथाओं में एक अभूतपूर्व समानता है। फ़र्क केवल इतना है कि यहाँ भारत में अपने जंगलों और जमीनों से जड़हीन कर दिये गये लाखों मूलनिवासी-आदिवासियों को भारतीय संविधान में दर्ज़ ‘आदिवासियों के अधिकारों और संवैधानिक सुरक्षा’ के तमाम प्रावधानों के बावजूद अस्तित्वहीन कर दिया गया। भारत में नगरनार, नेतरहाट, नियामगिरी और नगरौला से विकास और समृद्धि के नाम पर खदेड दिये गये लाखों ‘आदिवासियों’ और अमरीका में मिसिसिपी के तटों से उखाडे गये ‘इंडियन’ के मध्य सबसे बड़ी समानता यही है कि – उनमें से कोई भी फिर कभी ‘अपनी मूल-आदिवासी अस्मिता’ अर्थात आदिवासियत को वापस नहीं पा सका।
छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले के बोकराबहरा के आदिवासी मुखिया शिकारी बैगा ने अपने दादा से कहानी सुना था कि किस तरह मैकाल पहाड़ियों के वनसंपदा से भरपूर भूमि से बेदखल करते हुये अपनी ही चुनी हुई सरकार ने हजारों बैगाओं को सूखे मैदानों की ओर धकेल दिया। अपने आपको हमेशा से ‘सुखवासी’ (अर्थात सुख में रहने वाले) कहने और मानने वाले बैगाओं को ‘सरकारी विपन्नता के नये समीकरणों’ में कैद करते हुये तथाकथित ‘ग़रीबी रेखा’ से नीचे रहने को अभिशप्त कर दिया गया। आज यदि बैगा, अपने ही आजा-पुरखा की जमीनों से जुदा हैं तो उसका दोष किसी औपनिवेशिक साम्राज्य का नहीं। बल्कि बैगा, उस जनतांत्रिक ‘गणराज्य’ के फ़रमान का शिकार बने जिसे उम्मीदों के साथ उन्होंने स्वयं चुना था। एकता परिषद द्वारा किया गया अध्ययन (वर्ष 2010) बताता है कि, प्रचुर जैव-विविधता का उपयोग करते हुये 22 से अधिक प्रकार के परम्परागत बीजों से फसल, फल-फूल और सब्जियां पैदा करने वाला बैगा समाज आज ‘कुपोषितों’ की कतार में भौंचक खड़ा कर दिया गया है। बैगाओं का पुरातन गौरव और अस्मिता आज समाज और सरकार दोनों अप्रासंगिक मान लिया गया। विडंबना ही है कि न बैगाओं की अपनी मूलभूमि के मुआवजे मिले और न ही उन्हें मैदानों में दो-ग़ज ज़मीन का स्वामित्व मिला।
अमरीका के मिसिसिपी नदी के तटों से बर्बरतापूर्वक बेदखल मूलनिवासी ‘इंडियन’ और वहां से हजारों मील दूर मैकाल पहाड़ियों की श्रृंखलाओं से विस्थापित मूलनिवासी ‘बैगाओं’ के मध्य तथाकथित विकास और समृद्धि के झंडाबरदार, वो पूरी (तथाकथित) सभ्य समाजें और संस्कारित सरकारें खड़ी है, जिसके ये अपराध अक्षम्य हैं। केवल इसलिये नहीं कि उसने एक सभ्य समाज को सदा सर्वदा के लिये विपन्नता के कगार पर धकेल दिया बल्कि इसलिये भी कि उसके राजनैतिक वासनाओं ने पूरी आदिम सभ्यता के अस्तित्व को ही समाप्त कर दिया।
विश्व राजनीति के नये इतिहास में सौभाग्य अथवा दुर्भाग्य से अब तक तो ‘आदिवासी अस्मिता’ के एवज में मुआवजे के कोई मानक निर्धारित नहीं किये गये हैं। सौभाग्य इसलिये कि मानवता का मुआवजे में अवमूल्यन नहीं हो सकता, इतनी तो समझ रही। और दुर्भाग्य इसलिये कि इस समझ के बावजूद विकास और समृद्धि के नाम पर पूरी आदि मानवता को ही सुनियोजित तरीके से समाप्त किया गया और किया जा रहा है।
आदिवासी क्षेत्रों की अथाह संपदा की लूट के साथ और उसके बाद तथाकथित विकास के चौसर पर निहत्थे खडे मूलनिवासी आदिवासियों की अस्मिता, आज शेष समाज और सरकार के संगठित साज़िशों का सरल आखेट बन चुका है। अमरीका के नेशनल साइंस फाउंडेशन द्वारा कराये गये वैश्विक शोध के पश्चात् जर्नल ऑफ़ एनवायरनमेंट मैनेजमेंट में प्रकाशित शोध-आलेख (2017) में विस्तार से बताया गया है कि पूरी दुनिया में आदिवासियों-मूलनिवासियों के संसाधनों की लूट अथवा अधिग्रहण में मानव और सांस्कृतिक संपदा के मूल्यांकन के अवसर ही नहीं हैं। इसका अर्थ यह है कि वैश्विक राज्यतंत्र ने विकास और समृद्धि के नाम पर आदिम सभ्यता को समाप्त करने के स्वयंसिद्ध अधिकार हासिल कर लिये हैं।
आदिवासी अस्मिता, वास्तव में इस धरती की आदिम धरोहर है जिससे सभ्यतायें और संस्कृतियाँ जनमी हैं। इसे समाप्त करने का अर्थ उस ‘अंत की शुरुआत’ है, जिसके बाद धरती में मानव के अस्तित्व पर प्रकृति के प्रश्नचिन्ह लगेंगे ही। दुर्भाग्य से इसे ‘जलवायु परिवर्तन के वैश्विक समझौतों’ से रोका नहीं ही जा सकता। वह इसलिये नहीं कि समझौतों के प्रति राजनैतिक निष्ठाओं की कमी है, बल्कि इसलिये कि इन सभी समझौतों में ‘मानवीय भूलों’ को सुधारने के प्रति कोई प्रतिबद्धता है ही नहीं। समझौतों के दायरों में जिन तकनीकी और वैज्ञानिक समाधानों की वकालत की जा रही है वह ‘स्थायी समाधान’ है ही नहीं।
वास्तव में मानव सभ्यता के पुनर्स्थापना के अवसरों को तलाशे और तराशे बिना, मशीनों के बदले मानवीय समाधानों को वरीयता दिये बिना, भविष्य की आशंकाओं के बजाये इतिहास की भूलों को सुधारे बिना, और धरती के आदिम वंशजों की सांस्कृतिक धरोहरों के बिना ‘बेहतर और सुरक्षित भविष्य’ का कोई भी समाधान आधा-अधूरा ही नहीं, बल्कि समग्र रूप से ‘अंतिम और आत्मघाती’ ही साबित होगा।
(लेखक एकता परिषद के राष्ट्रीय महासचिव हैं)
(यह आलेख डाउन टू अर्थ हिंदी से साभार लिया गया है, इसे डाउन टू अर्थ पर पढने के लिए इस लिंक को क्लिक करें।)