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पुस्तक संस्कृति और पुस्तकालय: किताबें कुछ कहना चाहती हैं

पुस्तक संस्कृति और पुस्तकालय: किताबें कुछ कहना चाहती हैं टेक्नोलॉजी और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने पढ़ने की आदत और पुस्तक संस्कृति के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। पुस्तकालय कभी ज्ञान, विचार और संवाद के महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करते थे, लेकिन बदलते समय में उनकी भूमिका लगातार सीमित होती जा रही है।
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Book Review: छऊ की देह, आत्मा और परंपरा का समग्र वितान प्रस्तुत करती है यह पुस्तक

Book Review: छऊ की देह, आत्मा और परंपरा का समग्र वितान प्रस्तुत करती है यह पुस्तक संजय कुमार चौधरी की पुस्तक 'छऊ नृत्य : विन्यास व वितान—एक वीक्षण' छऊ नृत्य को केवल एक लोकनृत्य नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना, लोक स्मृति और परंपरा के व्यापक आयामों के रूप में प्रस्तुत करती है। संगीत नाटक अकादमी द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक इतिहास, कलात्मक संरचना, मुखौटा परंपरा, साधना, लोकजीवन और समकालीन चुनौतियों का गंभीर अध्ययन करती है।
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गुरु-पदावली: गुरु महिमा पर चुन्नू साहा की भावपूर्ण कविता

गुरु-पदावली: गुरु महिमा पर चुन्नू साहा की भावपूर्ण कविता 'गुरु-पदावली' कवि चुन्नू साहा की एक प्रेरणादायक कविता है, जिसमें गुरु की महिमा, उनके महत्व और जीवन में उनकी भूमिका का सुंदर वर्णन किया गया है। कविता बताती है कि गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन का सही मार्ग दिखाने वाला प्रकाश है।
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पुरुषोत्तम मास में क्यों बढ़ जाता है दान-पुण्य का महत्व? पढ़ें यह सुंदर काव्य रचना

पुरुषोत्तम मास में क्यों बढ़ जाता है दान-पुण्य का महत्व? पढ़ें यह सुंदर काव्य रचना कवयित्री सुनीता अग्रवाल ‘पिंकी’ की यह कविता अधिक मास अथवा पुरुषोत्तम मास के धार्मिक महत्व, दान-पुण्य, संयम और आध्यात्मिक साधना की महत्ता को सरल शब्दों में प्रस्तुत करती है।
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आपसी मनमुटाव ठीक नहीं

आपसी मनमुटाव ठीक नहीं ‘आपसी मनमुटाव ठीक नहीं’ कविता रिश्तों में बढ़ती दूरियों, खामोशी और संवादहीनता की पीड़ा को व्यक्त करती है। कवि चुन्नू साहा ने जीवन की नश्वरता और अपनों के महत्व को रेखांकित करते हुए संदेश दिया है कि मनमुटाव को लंबे समय तक नहीं पालना चाहिए।
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लोकार्पण: जब साहित्य औपचारिकता के 'समोसे' में खो गया....

लोकार्पण: जब साहित्य औपचारिकता के 'समोसे' में खो गया.... यह व्यंग्यात्मक आलेख आज के साहित्यिक लोकार्पण समारोहों की बदलती तस्वीर को सामने लाता है। लेखक ने दिखाया है कि कैसे किताबों का विमोचन अब साहित्यिक विमर्श से अधिक दिखावे, औपचारिकता, सोशल मीडिया प्रचार और चाय-समोसे के आयोजनों तक सीमित होता जा रहा है।
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कभी सोचे ना थे, महादेव: अन्याय और आस्था पर भावुक कविता

कभी सोचे ना थे, महादेव: अन्याय और आस्था पर भावुक कविता “कभी सोचे ना थे, महादेव” एक भावनात्मक कविता है, जिसमें अन्याय, पीड़ा और आस्था का गहरा चित्रण किया गया है। कवि ने महादेव से संवाद के माध्यम से जीवन में आए कठिन समय, एकतरफा सजा और न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।
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“उस दौर से इस दौर तक”: बाबा साहेब के संघर्ष की प्रेरक गाथा

“उस दौर से इस दौर तक”: बाबा साहेब के संघर्ष की प्रेरक गाथा “उस दौर से इस दौर तक” कविता समाज के संघर्ष, पीड़ा और बदलाव की कहानी को प्रस्तुत करती है। यह रचना बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के योगदान और दलित समाज के उत्थान को भावनात्मक रूप से दर्शाती है।
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“मायके की यादें”: मां के बिना सूना घर और भावनाओं का सैलाब

“मायके की यादें”: मां के बिना सूना घर और भावनाओं का सैलाब “मायके की यादें” एक भावनात्मक लघुकथा है, जो मां के जाने के बाद मायके लौटने वाली बेटी की संवेदनाओं को दर्शाती है। सूने आंगन, बंद कमरों और बचपन की यादों के बीच वह मां के स्नेह और दुलार को महसूस करती है।
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“तपस्या”: मां के संघर्ष से IPS बनी बेटी की प्रेरक कहानी

“तपस्या”: मां के संघर्ष से IPS बनी बेटी की प्रेरक कहानी “तपस्या” एक मार्मिक लघुकथा है, जो एक मां के संघर्ष, त्याग और दृढ़ संकल्प को दर्शाती है। समाज की रूढ़िवादी सोच के खिलाफ लड़ते हुए मीना अपनी बेटी को पढ़ाने के लिए घर छोड़ देती है।
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“बिजली रानी” कविता में बिजली संकट पर व्यंग्यात्मक प्रहार

“बिजली रानी” कविता में बिजली संकट पर व्यंग्यात्मक प्रहार कवि अनिल गुड्डू की कविता “बिजली रानी” बिजली कटौती और उससे होने वाली आम लोगों की परेशानियों को व्यंग्यात्मक और भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत करती है।
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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर एमपी अध्याय द्वारा अंतर्राष्ट्रीय ऑनलाइन कवि सम्मेलन संपन्न

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर एमपी अध्याय द्वारा अंतर्राष्ट्रीय ऑनलाइन कवि सम्मेलन संपन्न अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मकस कहानिका हिंदी पत्रिका के एमपी अध्याय द्वारा 10 मार्च 2026 को गूगल मीट के माध्यम से एक भव्य अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन कवि सम्मेलन आयोजित किया गया।
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