उठ जाग मुसाफिर भोर हुई
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उठ जाग मुसाफिर भोर हुई,

कब-तक यूँ आँखें बंद किये,
पड़े रहोगे इस जंजीरों में,
क्या भूल गए तुम भी तो उन शूरवीरों में ,
उठ जाग मुसाफिर भोर हुई,
देखो फिर दुनिया में शोर हुई।।
ये हाथ तेरे हैं तलवार तेरे,
फिर क्यूँ ऐसे है मौन पड़े,
पहचान तू अपनी शक्ति को,
क़दमों में होगा संसार तेरे,
देखो फिर से इंकलाब की शोर हुई,
उठ जाग मुसाफिर भोर हुई।।
क्या देश सकेगा उजड़े अपने उपवन को तू,
क्या रोक सकेगा, विचलित अपने इस मन को तू,
जो लिया है, तुमने उसका क़र्ज़ चुका दे तू,
कर्तव्य को पूरा कर, पुत्र का फ़र्ज़ निभा दे तू,
भ्रष्टाचार की अग्नि फिर से जोर हुई,
उठ जाग मुसाफिर भोर हुई,
देखो फिर दुनिया में शोर हुई।।
Edited By: Samridh Jharkhand