कोरोना काल में पनपता डर

कोरोना काल में पनपता डर

लगभग 40 दिनों से पूरे भारत वर्ष के लोग लॉकडाउन के बीच अपना समय व्यतीत कर रहा है। हर व्यक्ति अपने घर में किसी ना किसी तरीके से कोरोना के इस संकट के समय इस समय को बिताने का प्रयास कर रहा है। लेकिन ऐसा लग रहा है कि प्रकृति एक अलग सी दिशा की तरफ बढ़ रही है।

12 अप्रैल,13 अप्रैल और 10 मई को लगातार अलग-अलग तीव्रता के भूकंप के झटके महसूस किए गए। तीव्रता ज्यादा हो या कम हो, लेकिन अगर इसका केंद्र धरती में ज्यादा नीचे ना हो और ऊपर हो तो वह अत्यंत भयावह स्थिति सारे भारत के लिए बन सकती है।

पिछले एक माह से ना जाने प्रकृति किस विनाश की ओर इशारा कर रही है और बार- बार बारिश का औलो के साथ होना। एक अलग ही डर का माहौल पैदा कर रहा है। वहां मौसम विभाग इन सारी परिस्थितियों को सामान्य बता कर ऐसा लग रहा है कि लोगों का मन बहला रहा है। लगाकर आ रहे भूकंप और बिन मौसम वाली बरसात से मन को भयभीत करने वाली अवस्था हर व्यक्ति की होती जा रही है।

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आमतौर पर व्यक्ति जब घर से बाहर जाता था और अपने काम पर लग जाता था तो उसे कभी- कभी आए भूकंप के झटकों का पता भी नहीं चलता था। किंतु घर में रहकर अब वह इन्हें ज्यादा महसूस कर रहा है और स्थिति ऐसी हो गई है कि ना तो घर में रहा जाता है और ना बाहर जा सकता है।

लगातार समाचार चैनलों पर भूकंप ,कोरोना, मजदूरों के पलायन की न्यूज़ तो चलती ही रहती है। वहीं एम्स हॉस्पिटल के निर्देशक डॉक्टर रणदीप गुलेरिया जी के एक ताजा ब्यान के मुताबिक आने वाले माह जून जुलाई में तो कोरोना की स्थिति और भी भयानक होगी। लीजिये लोगो के डर को बढ़ाने में ऐसे लोगो का सहयोग बहुत ही दुखद लगता है।

जहां हर व्यक्ति इन भूकंपो से और बारिश का बिन मौसम ओलो के साथ पड़ने से परेशान हैं। वही भारत का एक बड़ा तबका, हमारा एक आम मजदूर एक जगह रह कर अपना भरण-पोषण नहीं कर पा रहा है। लगभग सभी मजदूर दूर-दूर राज्यों से आकर दिल्ली नोएडा और गुड़गांव जैसे विकसित राज्यों में रहकर अपने घर का और अपना भरण-पोषण कर रहे थे। लेकिन कोरोना काल में लगातार उनकी हालत खराब हो रही है। उन्होंने अब बिना अपनी जान की परवाह किए बगैर वापस अपने घर लौटना शुरू कर दिया है।

परिस्थिति कुछ ऐसी हो गई है कि गर्भवती महिलाएं और छोटे-छोटे बच्चे भी लगातार चलने के लिए मजबूर हैं। जहां एक और सभी राज्यों की सरकार सभी मजदूरों के लिए खाने पीने की व्यवस्था का दावा करती हैं। वहीं मजदूरों की स्थिति लगातार डर के माहौल के कारण एक जगह ना रुकने की हो गई है और वह जल्दी से चाहते हैं कि किसी तरीके से अपने घर पहुंचे और अगर उन्हें मरना ही है तो अपने घर जाकर मरे।

कोरोना काल के शुरू से ही लगातार लोग 2 ग़ज़ की दूरी और बार बार हाथ धोते रहने की बातों को मन से निभा रहे है। सभी लोग अपने आसपास के लोगों का और खुद का ख्याल भी रख रहे है। हर व्यक्ति इस बात को पालन कर रहा है। लेकिन जैसे-जैसे दिन आगे बढ़ रहै है।आम आदमी की मनोस्थिति खराब होती जा रही है।

घर बैठे बैठे कमाई के सारे जरिए खत्म हो जाए और खर्चों का लगातार अपनी जगह बने रहना आम आदमी को डराने की स्थिति में ले आया है। पर लगता है अब कोई कुछ भी कर ले। उनको तो कोरोना के मरीजों की बढ़ने की अवस्था में ही जीने की आदत डालनी होगी। शायद यह बात अलग अलग राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी समझ में आने लगी है।

पिछले कुछ दिनों से कई राज्यों के मुख्यमंत्री कुछ इस तरीके से न्यूज़ चैनलों पर अपना बयान देने लगे हैं। जिससे लग रहा है कि लॉक डाउन तो कोरोना के रहते रहते ही खोलना पड़ेगा और लोगों को भी अब अपना और दूसरों का ध्यान खुद ही रखना होगा। लोगों को अब ना केवल अपना ध्यान रखना होगा। बल्कि दूसरों का भी ध्यान रखना होगा।

लॉक डाउन खोलने के बाद सभी को मास्क लगाकर लगातार 2 गज की दूरी रखकर ही लोगों से मिलना जुलना होगा। जिससे वह अपने और अपने मित्रों की रक्षा कर सकें। कोरोना काल में अपने कार्य को करते रहते हुए यदि अपनी कमाई के साधनों को भी बनाए रखना है,तो 2 गज की दूरी का लगातार पालन करना होगा।

कोरोना की इस बीमारी ने एक चीज तो लोगों को समझा दी है कि अब अपने बारे में ही लगातार सोचने से आप जिंदा नहीं रह सकते। यदि आपको जीवन में आगे बढ़ना है तो दूसरों का भी ख्याल उसी तरह करना होगा। जिस तरह आप अपना और अपने परिवार का रखते हैं उसी तरह सभी का ख्याल रखना होगा। तभी यह प्रकृति और हमारा भारतवर्ष सुरक्षित रहेगा।

अंत में एक निवेदन के साथ ये लेख खत्म करता हूँ कि दूसरों की सुरक्षा को अपनी सुरक्षा मानेंगे तभी आप जी पाएंगे वरना आज कोरोना और ना जाने कल भविष्य में क्या-क्या झेलना पड़ेगा। अब खुद जीयो और दुसरो को भी जीने दो शब्दो का पालन दिल से करना होगा।

 

-नीरज त्यागी
ग़ाज़ियाबाद

Edited By: Samridh Jharkhand

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