जितिया 2025: जितिया कब है 14 या 15 सितंबर? जानें तिथि, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और महत्व
जितिया व्रत की शुरुआत और पारण विधि
समृद्ध डेस्क: हर साल आश्विन मास की अष्टमी तिथि को जीवित्पुत्रिका व्रत रखा जाता है। इस दिन माताएं अपने बच्चों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखमय जीवन की कामना के लिए उपवास रखती हैं। यह व्रत आश्विन मास की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इस दिन माताओं द्वारा अपने बच्चों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखमय जीवन की कामना के लिए उपवास रखा जाता है। इसे कठिनतम व्रतों में से एक माना जाता है। दरअसल, यह व्रत तीन दिनों तक चलता है और इसमें नहाय-खाय से लेकर निर्जल उपवास और पारण तक की परंपरा निभाई जाती है।
जितिया कब है 14 या 15 सितंबर?
ज्योतिष अभिषेक पांडेय जी के मुताबिक,

अश्विन माह के सप्तमी तिथि यानी कि 13 सितंबर को नहाय-खाय से यह व्रत आरंभ होगा

अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का समापन- 15 सितंबर को देर रात 03 बजकर 06 मिनट पर होगा अतः
15 सितंबर को जितिया व्रत का पारण कर व्रत संपन्न किया जाएगा
कब और कैसे हुई शुरुआत?
जितिया व्रत की शुरुआत कब हुई, इसका कोई निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता है, लेकिन इसका गहरा संबंध कई पौराणिक कथाओं से है, जो इस व्रत की महत्ता को दर्शाती हैं।
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जीमूतवाहन की कथा: सबसे प्रचलित कथा गंधर्वों के राजकुमार जीमूतवाहन से जुड़ी है। कहा जाता है कि जीमूतवाहन ने नाग जाति की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने का संकल्प लिया था। उन्होंने एक बूढ़ी नागिन के इकलौते बेटे की जान बचाने के लिए खुद को गरुड़ के समक्ष प्रस्तुत कर दिया। उनकी इस महान त्याग और दयालुता से प्रभावित होकर, गरुड़ ने उन्हें जीवनदान दिया और नागों को अपना भोजन न बनाने का वचन दिया। तभी से, माना जाता है कि जो माताएं जीमूतवाहन की पूजा करती हैं, उनके बच्चे मृत्यु के मुख से भी वापस आ जाते हैं।
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चील और सियारिन की कथा: एक और कथा के अनुसार, एक चील और एक सियारिन ने एक साथ जितिया व्रत रखने का संकल्प लिया। चील ने पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ निर्जला व्रत का पालन किया, जबकि सियारिन भूख और प्यास से व्याकुल होकर चोरी-छिपे भोजन कर लिया। अगले जन्म में, चील एक राजकुमारी बनी और उसके सात पुत्र हुए जो सभी दीर्घायु और खुशहाल थे, जबकि सियारिन के सभी बच्चे जन्म लेते ही मर गए। यह कथा हमें व्रत में संयम, श्रद्धा और ईमानदारी के महत्व का पाठ पढ़ाती है।
धार्मिक मान्यताएं और महत्व
जितिया व्रत का धार्मिक और सामाजिक महत्व बहुत गहरा है।
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संतान की सुरक्षा: यह व्रत मुख्य रूप से संतान की सुरक्षा और लंबी आयु के लिए रखा जाता है। माताएं निर्जला उपवास रखकर भगवान जीमूतवाहन से अपने बच्चों के जीवन में आने वाली हर बाधा और संकट को दूर करने की प्रार्थना करती हैं।
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कठिन तपस्या: यह व्रत अत्यधिक कठिन होता है। व्रती माताएं नहाय-खाय (स्नान और पवित्र भोजन) के बाद, पूरे दिन और पूरी रात निर्जला (बिना पानी) उपवास रखती हैं। अगले दिन, सूर्योदय के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। यह तपस्या माताओं के असीम त्याग और अपने बच्चों के प्रति उनकी भक्ति को दर्शाती है।
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परंपरा और आस्था: यह व्रत पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही एक परंपरा है, जो माताओं और संतानों के बीच के रिश्ते को और भी मजबूत बनाती है। यह पर्व पारिवारिक एकता और आपसी प्रेम का भी प्रतीक है।
यह व्रत आज भी उसी श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है। जितिया केवल एक व्रत नहीं, बल्कि यह माताओं के ममतामयी हृदय का साक्षात् प्रदर्शन है, जो अपनी संतान के लिए किसी भी कठिनाई का सामना करने को तैयार रहती हैं।
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