कुपोषण और आदिवासी बच्चे: योजनाएं कागजों पर ही? NFHS-5 आंकड़े चौंकाने वाले

समाधान की दिशा में क्या कदम जरूरी?

कुपोषण और आदिवासी बच्चे: योजनाएं कागजों पर ही? NFHS-5 आंकड़े चौंकाने वाले
सांकेतिक इमेज (IS: Vocal media)

समृद्ध डेस्क: झारखंड के आदिवासी इलाकों में कुपोषण आज भी एक गंभीर चुनौती बना हुआ है, जहां सरकारी योजनाएं कागजों पर तो चमक रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयान करती हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में 36 लाख 64 हजार बच्चों में से 15 लाख बच्चे कुपोषित (42%) हैं. वहीं करीब 03 लाख (9%) बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं, और खासकर अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय के 56 प्रतिशत बच्चे कुपोषण उपचार केंद्रों तक पहुंचते हैं। इन आंकड़ों के बीच रांची के रिम्स रेफरल कुपोषण उपचार केंद्र में पिछले डेढ़ साल में महज 84 बच्चों का इलाज ही हो सका, क्योंकि अभिभावकों को इसकी सही जानकारी ही नहीं मिल पा रही।


झारखंड का पूरा NFHS-5 रिपोर्ट पीडीएफ 👇
https://drive.google.com/file/d/1j_UP2jx6d8xgPrj6RmUJGbKikxJ8oR57/view?usp=sharing

आदिवासी बच्चों पर कुपोषण का कहर

झारखंड के आदिवासी बहुल जिलों जैसे गुमला, पश्चिम सिंहभूम और कोडरमा में कुपोषण ने नौनिहालों का भविष्य दांव पर लगा रखा है। कुपोषण उपचार केंद्रों (एमटीसी) में भर्ती 53 प्रतिशत गंभीर कुपोषित बच्चे लड़कियां हैं, और दो साल से कम उम्र के बच्चों का हिस्सा आधे से ज्यादा है। ग्रामीण आदिवासी आबादी में 0-6 साल के बच्चों में प्रोटीन-कैलोरी कुपोषण की दर 57 प्रतिशत तक है, जो गरीबी, जंगलों पर निर्भरता और पोषण की कमी से जुड़ी हुई है। इतना ही नहीं, 67.5 प्रतिशत बच्चों में एनीमिया की समस्या ने उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को चरमरा दिया है, जिससे छोटी-मोटी बीमारियां भी जानलेवा साबित हो रही हैं।

सरकारी योजनाएं: घोषणाएं बनाम हकीकत

झारखंड सरकार ने कुपोषण मुक्त अभियान के तहत कई कदम उठाए हैं, जैसे 96 एमटीसी केंद्र जहां प्रतिदिन 130 रुपये की दर से सब्जियां और स्पेशल आहार दिया जाता है। हाल ही में 18 जनवरी 2025 से शुरू हुई 'शिशु शक्ति खाद्य पैकेट योजना' पश्चिम सिंहभूम के चक्रधरपुर से पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चली, जिसमें प्रोटीन, विटामिन और सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर पैकेट वितरित हो रहे हैं। अब एमटीसी में कुपोषित बच्चों की मांओं को भी पौष्टिक भोजन और आयरन-फोलिक एसिड गोलियां दी जा रही हैं, जो रिम्स के पीएसएम विभाग की रिसर्च पर आधारित है। आकांक्षी जिला कार्यक्रम के तहत गुमला जैसे क्षेत्रों में आंगनबाड़ी केंद्रों पर पोषण माह मनाया जा रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर मैनपावर की कमी और जागरूकता के अभाव ने इन योजनाओं को सीमित कर दिया है।

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सरकारी ओपन डेटा पोर्टल: जिसमें जिला-स्तर के NFHS-5 डेटा फ़ैक्टशीट्स मिलते हैं। 👇

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https://www.data.gov.in/

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जमीनी बाधाएं और विफलताएं

हकीकत यह है कि आदिवासी परिवारों तक योजनाओं का लाभ पहुंच ही नहीं पा रहा। रिम्स सेंटर में न्यूट्रिशनिस्ट, रसोइया और वार्ड बॉय की कमी के कारण पहले तो भोजन व्यवस्था ठप रही, और अब भी अभिभावक दूरदराज के गांवों से इलाज के लिए नहीं पहुंच पाते। एनएफएचएस-5 के मुताबिक, शहरी क्षेत्रों में 26.8 प्रतिशत बच्चे बौनेपन के शिकार हैं, जबकि अति गंभीर कुपोषण 9.1 प्रतिशत है, लेकिन सरकारी दावों के बावजूद 2014 के आंकड़ों जैसी स्थिति बनी हुई है। आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका बढ़ाने की बात तो होती है, मगर निगरानी की कमी से पैकेट और दवाएं गांवों तक नहीं पहुंच रही।

आगे की राह: क्या हो समाधान?

कुपोषण की इस जंग को जीतने के लिए जिला स्तर पर सख्त निगरानी, रेफरल सेंटर्स का व्यापक प्रचार-प्रसार और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को सशक्त बनाना जरूरी है। आदिवासी समुदायों में जागरूकता अभियान चलाकर मां-बच्चों को पोषण शिक्षा देनी होगी, ताकि सरकारी योजनाएं कागजों से निकलकर जिंदगियों में उतरें। अगर तत्काल कदम नहीं उठे, तो झारखंड का भविष्य कुपोषण के आगोश में खो सकता है।

Edited By: Samridh Desk
Sujit Sinha Picture

सुजीत सिन्हा, 'समृद्ध झारखंड' की संपादकीय टीम के एक महत्वपूर्ण सदस्य हैं, जहाँ वे "सीनियर टेक्निकल एडिटर" और "न्यूज़ सब-एडिटर" के रूप में कार्यरत हैं। सुजीत झारखण्ड के गिरिडीह के रहने वालें हैं।

'समृद्ध झारखंड' के लिए वे मुख्य रूप से राजनीतिक और वैज्ञानिक हलचलों पर अपनी पैनी नजर रखते हैं और इन विषयों पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हैं।

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