सोशल मीडिया ट्रोलिंग: अभिव्यक्ति की आज़ादी या डिजिटल बदतमीज़ी? ट्रोलिंग केस और कानून
समृद्ध डेस्क: सोशल मीडिया ट्रोलिंग आज हर आम इंसान से लेकर बड़े सेलिब्रिटी तक की जिंदगी में घुस चुकी है। ये सवाल उठता है कि क्या ये सिर्फ अपनी राय रखने की आजादी है या फिर डिजिटल दुनिया में बेलगाम बदतमीजी का रूप?
ट्रोलिंग का बढ़ता चलन
भारत में सोशल मीडिया यूजर्स की तादाद 50 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है, और इसी के साथ ट्रोलिंग के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। खासकर 2025-26 में राजनीतिक बहसों, सेलिब्रिटी पोस्ट्स और पर्सनल डिस्प्यूट्स पर ट्रोल्स की बाढ़ आ गई है। एक हालिया केरल केस में, जहां एक बस में कंटेंट क्रिएटर शिम्जिथा मुस्तफा ने सेल्स मैनेजर दीपक यू पर गलत छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए वीडियो पोस्ट किया, तो ट्रोल्स ने दीपक को इतना घेरा कि वो सुसाइड कर लिया। ये घटना दिखाती है कि कैसे एक वीडियो वायरल होते ही बिना जांच के लोग ट्रायल कर देते हैं, जो जिंदगियां बर्बाद कर सकता है। सर्वे बताते हैं कि टीनएजर्स में साइबरबुलिंग के केस 2025 में दोगुने हो गए, जहां ट्रोलिंग से मेंटल हेल्थ पर बुरा असर पड़ रहा है।
अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाएं

कानूनी हथियार ट्रोल्स के खिलाफ
भारत में ट्रोलिंग रोकने के लिए स्पेसिफिक लॉ नहीं है, लेकिन आईटी एक्ट 2000 की धारा 67 (अश्लील कंटेंट) और धारा 66E (प्राइवेसी ब्रेक) से निपटा जा सकता है। आईपीसी की धारा 354D (स्टॉकिंग), 507 (अनाम धमकी) और 503 (क्रिमिनल इंटिमिडेशन) भी ट्रोल्स पर लगाई जाती हैं। श्रेया सिंघल केस में धारा 66A हटा दी गई क्योंकि वो फ्री स्पीच के खिलाफ थी, लेकिन बाकी सेक्शन्स अभी सख्ती से लागू हो सकते हैं। आंध्र हाईकोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया पर गलत जानकारी या अश्लील कमेंट्स कानूनन अपराध हैं, प्लेटफॉर्म्स को छूट नहीं। फिर भी, गुमनाम अकाउंट्स की वजह से एक्शन लेना मुश्किल होता है।
समाज पर गहरा असर
ट्रोलिंग न सिर्फ पीड़ित को तोड़ती है, बल्कि पूरे समाज में नफरत फैलाती है। महिलाएं, माइनॉरिटीज और पब्लिक फिगर्स सबसे ज्यादा टारगेट होते हैं, जो डिबेट को दबा देती है। जर्नल स्टडीज दिखाती हैं कि ट्रोलिंग मिसइंफॉर्मेशन फैलाती है और पॉलिटिकल डिस्कोर्स को खराब करती है। सुप्रीम कोर्ट के जज भी ट्रोल्स के शिकार हो चुके हैं, जहां उन्होंने इसे 'नृशंस' बताया लेकिन इग्नोर करने की सलाह दी।
आगे की राह
ट्रोलिंग को कंट्रोल करने के लिए स्ट्रॉन्ग रेगुलेशन्स, डिजिटल लिटरेसी और प्लेटफॉर्म्स पर बेहतर मॉडरेशन जरूरी है। ड्राफ्ट डीपीडीपी रूल्स 2025 कुछ राहत दे सकते हैं, लेकिन इंप्लीमेंटेशन की चुनौती बनी हुई है। यूजर्स को भी जिम्मेदार बनना होगा ताकि डिजिटल स्पेस डेमोक्रेटिक रहे, बदतमीजी का अड्डा न बने।
