MDA के दौरान अपने जिले में 100% लाभार्थियों को फाइलेरिया रोधी दवाएं खिलाने का लक्ष्य रखें : अभियान निदेशक

झारखंड सरकार द्वारा जिला स्तरीय प्रशिक्षकों का एमडीए कार्यक्रम पर प्रशिक्षण संपन्न

इस कार्यक्रम के सफल क्रियान्वयन के लिए शनिवार को स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग, झारखंड के अभियान निदेशक भुवनेश प्रताप सिंह की अध्यक्षता में उपर्युक्त 8 जिलों के सिविल सर्जन, जिला वीबीडी पदाधिकारी, जिला वीबीडी सलाहकार, मलेरिया निरीक्षक एवं प्रभारी चिकित्सक पदाधिकारियों को प्रशिक्षित किया गया, ताकि इसके अंतर्गत संपन्न की जाने वाली गतिविधियाँ सही रूप से संपादित हों।
इस अवसर पर राज्य के अभियान निदेशक भुवनेश प्रताप सिंह ने कहा कि मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के दौरान फाइलेरिया रोधी दवाओं का वितरण नहीं, बल्कि प्राशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों के सामने लाभार्थियों द्वारा दवा का सेवन सुनिश्चित होना चाहिए।
कार्यक्रम के दौरान 100ः लाभार्थियों द्वारा फ़ाइलेरिया रोधी दवाओं का सेवन किया जाना सुनिश्चित करें। समाज के लोगों को भी इस कार्यक्रम में ज़िम्मेदारी निभाने के लिए प्रेरित कीजिए, क्योंकि किसी भी कार्यक्रम की सफलता के लिए सामुदायिक सहभागिता बहुत आवश्यक होती है।
प्रशिक्षण में झारखंड के राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी, वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम डॉ अनिल कुमार ने बताया कि सितम्बर में शुरू किये जा रहे मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन कार्यक्रम में फाइलेरिया से मुक्ति के लिए 2 वर्ष से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और अति गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों को छोड़कर सभी लोगों को उम्र के अनुसार डीईसी और अलबेंडाजोल की निर्धारित खुराक प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा घर-घर जाकर अपने सामने मुफ़्त खिलाई जाएगी। डॉ अनिल ने यह भी बताया कि आमतौर पर बचपन में होने वाला फाइलेरिया संक्रमण लिम्फैटिक सिस्टम को नुकसान पहुंचाता है और अगर इसका इलाज न किया जाए तो इससे शारीरिक अंगों में असामान्य सूजन होती है।
फाइलेरिया के कारण चिरकालिक रोग जैसे हाइड्रोसील यानी अंडकोष की थैली में सूजन, लिम्फेडिमा यानी अंगों में सूजन से ग्रसित लोगों को अक्सर सामाजिक भेदभाव सहना पड़ता है। इससे उनकी आजीविका व काम करने की क्षमता भी प्रभावित होती है। उन्होंने बताया कि राज्य में वर्ष 2021 के आंकड़ों के अनुसार लिम्फेडिमा यानी अंगों में सूजन के लगभग 43768 मरीज़ हैं और हाइड्रोसील यानी अंडकोष की थैली में सूजन के 46220 मरीज़ हैं।
कार्यक्रम के बढ़ते क्रम में, एंटोमोलोजी की राज्य परामर्शी सज्ञा सिंह ने राज्य सरकार द्वारा आगामी मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की रणनीति एवं इससे जुड़े अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि राज्य स्तर से जिला स्तर तक विभिन्न विभागों एवं स्वयं सेवी संस्थाओं के साथ समन्वय बनाकर कार्य किया जा रहा है ताकि कार्यक्रम में किसी भी संसाधन की कमी न होने पाए।
इसी क्रम को बढ़ाते हुए राज्य की आईईसी परामर्शी नीलम कुमार ने लोगों में जागरूकता हेतु विकसित की गयी प्रचार. प्रसार सामग्री पर भी विस्तृत चर्चा की और प्रतिभागियों को समझाया कि इसके माध्यम से फाइलेरिया से संबंधित संदेशों को समुदाय के अंतिम छोर तक कैसे पहुंचाया जा सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के राज्य एनटीडी समन्वयक डॉ अभिषेक पॉल ने अपने संबोधन में लिम्फेटिक फाइलेरिया बीमारी की गंभीरता को समझाते हुए इसके उन्मूलन हेतु प्राथमिकता के साथ मिशन मोड में कार्य करने की आवश्यकता पर जोर दिया और बताया कि यह बीमारी लोगों को दिव्यांग और अक्षम बना देती है।
उन्होंने कहा कि कार्यक्रम की प्रतिदिन मोनिटरिंग और समीक्षा की जायेगी ताकि अगर कोई भी समस्या आये तो तुरंत उसका निदान किया जा सके।
प्रशिक्षण में तकनीकी विशषज्ञों द्वारा मोनिटरिंग फॉरमेट, प्रशिक्षण, वित्तीय प्रबंधन और पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के विभिन्न आयामों पर भी चर्चा की गयी ।
इस अवसर पर ग्लोबल हेल्थ स्ट्रेटजीज के अनुज घोष, प्रोजेक्ट कंसर्न इंटरनेशनल के कलाम खान और केयर संस्था के प्रतिनिधि नीरज कुमार ने भी मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन कार्यक्रम के दौरान उनकी संस्थाओं द्वारा राज्य सरकार को दिए जा रहे सहयोग के बारे में बताया।
प्रशिक्षण में एनआईएमआर के प्रतिनिधि डॉ पीयूष कुमार, राज्य परामर्शदाता प्रशिक्षण बिनय कुमार, राज्य परामर्शदाता पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप जयंत देव सिंह और राज्य परामर्शदाता वित्त, प्रवीण कुमार ने भी सक्रिय प्रतिभाग किया।