साक्षात्कार: टीबी का इलाज पूरा करना जरूरी, नहीं तो हो सकती हैं ये बीमारी: डॉ नीता झा

टीबी जैसे बीमारियों को लेकर इलाज तो हो रहे हैं और ये इलाज पहले से ज्यादा कारगर भी साबित हो रहा है. मगर आज भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो जानकारी के अभाव में बीमारी को पनपने देते हैं जिसका अंजाम उनको और उनके परिवार को भुगतना पड़ता है. कई बार टीबी जैसी बीमारियां जानकारी के अभाव के कारण या फिर दवाइयों का कोर्स पूरा नहीं होने के कारण जानलेवा भी साबित होती है. आज हम टीबी से जुड़े लक्षण और उससे जुड़े जानकारियों के बारे में बताएंगे. इससे जुड़े जानकीरियों के लिए समृद्ध झारखंड संवाददाता दीक्षा प्रियदर्शी ने डॉक्टर नीता झा से इस बीमारी से जुड़ी जटिलताओं के बारे में बातचीत की है. डॉ नीता झा डायरेक्टर, सस्टेनेबल इंटरवेंशन, वर्ल्ड हेल्थ पार्टनर्स और वो पब्लिक हेल्थ स्पेशलिस्ट के तौर पर भी जानी जाती हैं. डॉ नीता 8 साल से टीबी पर रिसर्च कर रही हैं. इसके अलावा वें बिहार में 22 साल से पब्लिक हेल्थ सेक्टर में अपना कंट्रीब्यूशन दे रही हैं.

सवाल: टीबी बीमारी के लक्षण क्या हैं और इसका इलाज कैसे होता है ?
जवाब: टीबी की बीमारी में जो मुख्य तौर पर लक्षण देखे जाते हैं वो ये है कि अगर दो हफ्ते से ज्यादा खासी, खासी के साथ हल्का बुखार महसूस हो रहा हो या फिर बलगम में खून आ रहा है तो जांच की जरूरत है और जांच कराना चाहिए.
सवाल: आप किस प्रकार टीबी उन्मूलन कार्यक्रम में अपना सहयोग दे रही हैं ?
जवाब: मैं वर्ल्ड हेल्थ पार्टनर संस्था से जुड़ी हुई हूँ. ये संस्था 2012 से ही टीबी उन्मूलन के लिए काम कर रही है. पहले फंड बाहर (दूसरे देश) से आते थे जिसकी मदद से हम काम करते थे. मगर 2019 से हमलोग ने बिहार सरकार के साथ टाई- अप किया है. 2019 से हम करीब 8 जिलों में बिहार सरकार के साथ मिलकर टीबी उन्मूलन के लिए काम कर रहे हैं. ये टाई- अप प्राइवेट सेक्टर में जो टीबी मरीज हैं उनकी देखभाल कैसे की जाए और उनके नोटिफिकेशन हो सके. 2012 के बाद टीबी को एक नोटिफाइबल डिजीज माना गया है. जब भी किसी को पता चलता है कि उसे टीबी है तो उसे गवर्मेंट में नोटिफाइड कराना पड़ता है.
ताकि निजी क्षेत्र में इलाज करवाने के जाने वाले मरीजों को भी सभी सुविधाएं मिल सके और वो इस दवाइयों का कोर्स पूरा कर सके. ये इसलिए भी जरूरी था क्योकि 70 प्रतिशत मरीज निजी क्षेत्र में ही इलाज के लिए जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि बेहतर इलाज प्राइवेट अस्पताल में ही होता है. जब ज्यादातर मरीज निजी क्षेत्र में इलाज करवा रहे हैं तो हमारे लिए ये जरुरी था कि हम उन्हें कैसें नोटिफाई करें और उन्हें मुफ्त जांच और दवाइयां मुहैया करवा सके. ताकि मरीज 6 महिने का टीबी के इलाज का कोर्स पूरा कर सके और 6 महिने तक समय-समय पर उनका फॉलोअप कर सके. हमारा काम होता है उनको फॉलोअप करता उन्हें समझाना कि आप अपने 6 महिने का दवाइयों का कोर्स पूरा करें तभी इस बीमारी से निजाद मिलेगी और इसलिए ही हमे सरकार ने नियूक्त किया है ताकि हम लोगों को समझा और लोग अपना बचाव कर सके.
सवाल: प्राइवेट सेक्टर का सहयोग कितना महत्वपूर्ण है टीबी उन्मूलन कार्यक्रम के लिए?
जवाब: मैंने जैसा बताया कि ज्यादातर लोग इलाज के लिए प्राइवेट सेक्टर में ही जाते हैं और इसलिए प्राइवेट सेक्टर का योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है टीबी उन्मूलन के लिए. अगर 70 प्रतिशत मरिज निजी क्षेत्र में इलाज के लिए जा रहे हैं तो अधिकतर टीबी मरीज हमारे हाथ से छूट जाएंगे. इसलिए हमें प्राइवेट सेक्टर से तालमेल बिठा के रखना पड़ता है ताकि मरीजों को हम हर सुविधा मुहैया करा सके और इसलिए हम कह सकते हैं कि इनका योगदान बहुत महत्वपूर्ण होता है.
सवाल: प्राइवेट सेक्टर के साथ मिलकर के काम करना कितना सहज है आपलोगों के लिए?
जवाब: प्राइवेट सेक्टर से अगर हम समझते हैं कि हम जो काम कर रहे हैं वो एक मॉडल के रूप में कर रहे हैं. हमारे साथ मिलकर कुछ फील्ड वर्कर काम करते हैं जो हमारे साथ इंसेंटिव पर काम करते हैं. जैसे कि प्राइवेट सेक्टर से जुड़े कुछ कंपाउंडर या फिर डॉक्टर के असिस्टेंट जो इस काम में हमारा सहयोग करते हैं. हम गांव के भी जो प्रैक्टिशनर हैं उनको भी हम किसी तरह अपने साथ जोड़े रखते हैं ताकि वह मरीजों को शहर के बड़े डॉक्टर हैं उनके पास रेफर कर सके.
इसके अलावा जितने भी लैब हैं जहां टीबी का टेस्ट होता है उनको भी हमने अपने साथ जोड़ हुआ है ताकि हमें ज्यादा से ज्यादा मरीजों के बारे में पता चल सके और हम उन्हें नोटिफाइड कर सकें. सभी लोग को जोड़ करके हम लोगों ने एक मॉडल तैयार किया है ताकि कोई भी टीबी मरीज नहीं छूटे. गांव के जो प्रैक्टिशनर की बात करें तो वो जो लंबे समय से गांव में इलाज कर रहे हैं उन्हें भी हम इसकी ट्रेनिंग देते हैं ताकि वह लक्षण को समझ सके और मरीज को तुरंत एमबीबीएस डॉक्टर के पास रेफर कर सके.
सवाल: अगर बिहार में प्रैक्टिशनर की बात करें तो छोटे- छोटे गांव में बहुत से ऐसे प्रैक्टिशनर हैं जिनके पास एमबीबीएस की डिग्री नहीं है, लेकिन वह लंबे समय से गांव में इलाज कर रहे हैं उनको ट्रेनिंग के लिए तैयार करना और समझाना आप लोगों के लिए कितना सहज होता है?
जवाब: गांव के जो प्रैक्टिशनर होते हैं ज्यादा समझते हैं इन चीजों को इसका कारण यह है क्योंकि उनके पास बहुत ज्यादा मरीज आते हैं. हमारा काम है हम उनसे संपर्क करते हैं और उनके गांव जाते हैं और उन्हें ट्रेनिंग देते हैं उन्हें समझाते हैं अगर आपको इन लक्षणों वाला मरीज मिलता है तो आप उनको तुरंत किसी एमबीबीएस डॉक्टर की पास रेफर कीजिए. हम एक लिंक बना देते हैं ताकि वह मरीज को किसी एमबीबीएस डॉक्टर के पास भेज सकें.
सवाल: वर्तमान में आप और आपकी टीम टीबी उन्मूलन के लिए जो भी काम कर रही हैं, आप लोगों को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है आपको क्या लगता है कि आप की प्लानिंग के अनुसार कितना काम हो पा रहा है ?
जवाब: हम जो काम कर रहे हैं ज्यादातर हमारे अनुसार काम हो रहा है. लेकिन अभी भी हमें बहुत ही चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि हम चाह रहे हैं की प्राइवेट सेक्टर में सभी डॉक्टर जुड़े और सभी नोटिफाइड करें मगर ऐसा हो नहीं पा रहा है क्योंकि बहुत सारे डॉक्टर अभी कहते हैं जो भी बड़े डॉक्टर है वो कहते हैं कि हमारे पास समय नहीं है नोटिफिकेशन जैसे काम के लिए. इसलिए बड़े डॉक्टर अभी भी छूट रहे हैं. दूसरी तरफ जब हम लोगों की काउंसलिंग करते हैं तो वह अभी भी नहीं समझते हैं कि यह बीमारी ठीक हो सकती है और वह दवा नहीं छोड़े. मरीज एक महीने में अगर ठीक हो जा रहा है तो वह दवा छोड़ देता है. इसलिए हम लोगों को उनका फॉलोअप करवाना पड़ता है हम उनको बार- बार समझाते हैं कि अगर आप एक या दो महीने में दवा छोड़ देंगे तो आप का कोर्स पूरा नहीं होगा. इसलिए अगर आपको ठीक लग रहा है तो भी कोर्स पूरा करना है. नहीं तो आपको टीवी की एक नई बीमारी जो कि मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस (MDR-TB) है वो हो जाएगी. जिसके बाद ये दवा उन पर काम नहीं करेगी.
सवाल: मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस (MDR-TB) किस तरह की बीमारी है और इस बीमारी के होने के बाद ठीक होने में कितना समय लगता है?
जवाब: मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस (MDR-TB)बोला जाता है. नॉर्मली जो टीवी की दवा है वह 6 महीने तक चलती है और बीमारी ठीक हो जाती है. लेकिन कोई मरीज अगर बीच में 1 या 2 महीने के बाद दवा खा कर छोड़ देता है तो उनको इन दवाओं से रेसिस्टेंट डेवलप हो जाता है. जिसके कारण उनके इलाज में दूसरी दवा लगती है जो कि और उस बीमारी का इलाज फिर एक या डेढ़ साल चलता है.
संदेश
मैं पाठकों को यह संदेश देना चाहती हूँ कि वह लोगों तक ज्यादा से ज्यादा इस बात को फैलाए कि अगर इस तरह के लक्षण वाले कोई भी मरीज आस- पास हैं तो जाए डॉक्टर के पास अपना इलाज कराएं. इसके साथ ही 6 महीने तक दवाइयां खाएं इलाज पूरा करें ना कि बीच में छोड़ दें. इसके अलावा जितना ज्यादा हो सके जागरूक रहें.