आरके सिन्हा का आलेख : कोरोना काल में जो बने बेसहाराओं का सहारा
आरके सिन्हा
कोरोना वायरस से पैदा हुए हालातों के चलते दो तरह के लोग सामने आए हैं। पहले, वे जो संक्रमण को रोकने के लिए जारी लॉकडाउन को तोड़ने में पीछे नहीं रहे। यह करके उन्होंने बताना चाह कि वे सरकार से ऊपर हैं। दूसरे, जो इस कठिन काल में बेबस लोगों की मदद को आगे आए।


वैसे कुछ ज्ञानी लोग कह रहे हैं कि अगर सरकार ने लॉकडाउन के स्थान पर सिर्फ धारा 144 ही लगा दी होती, तो भी ठीक ही रहता। वे अपने तर्क में यह भी कहते हैं कि जनता को कोरोना के खतरों से जागरूक करने के लिए कुछ कार्यक्रम ही काफी थे। अब इन महान आत्माओं को कौन बताए कि अगर लॉकडाउन न किया गया होता तो देश मे कोरोना संक्रमित रोगियों का आंकड़ा लाखों में होता। पर इन्हें यह बात कहां समझ आने वाली है। हालांकि यह सच है कि कोरोना के कारण सामान्य जीवन पंगु हो गया है। हरेक इंसान की परेशानियां बढ़ीं और बिगड़ीं हैं। लाखों नौकरियां जा रही हैं। मजदूरों के साथ तो बेहद क्रूर और शर्मनाक अमानवीय व्यवहार किये जाते रहे हैं।
जो ख़ड़े हुए बेबसों के लिए
हालांकि इस मुश्किल दौर में देश का सक्षम समाज आगे आया है। उसने बेबस-असहाय लोगों की भरपूर मदद की । मध्य प्रदेश के शहर ग्वालियर में समाज सेवी और लेखक डा. राकेश पाठक और उनके साथी पैदल ही अपने घरों की तरफ जा रहे प्रवासी मजदूरों के लिए लजीज भोजन की व्यवस्था कर रहे हैं। इन श्रमिकों को मिल रहे हैं स्वादिष्ट मालपुए, आलू की तरीदार सब्ज़ी, एक सूखी सब्ज़ी, देसी घी की पूड़ियाँ और मट्ठा। बाद में शुद्ध-साफ़ घड़े की सौंधी महक वाला ठंडा ठंडा पानी भी। पियो तो पीते ही चले जाओ।
दिल्ली में कई समाजसेवी संस्थाएं गरीबों के लिए छत से लेकर भोजन की व्यवस्था कर रही हैं। आर्य समाज की तरफ से पूर्वी दिल्ली के यमुना स्पोर्ट्स काम्पलेक्स में बिहार, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल के हजारों मंजदूरों को भोजन के पैकेट बांटे जा रहे हैं। इन्हें मास्क भी दिये जा रहे हैं।
गुरुद्वारों द्वारा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ताओं द्वारा तो पूरे देश में ही सेवा कार्य लगातार चल रहे हैं ।
मजदूरों को साथ मिलता किसानों का
सबसे सुखद यह है कि कई इलाकों में निजी स्तर पर किसान और किसान संगठन भी प्रवासी मजदूरों की मदद के लिए आगे आ रहे हैं। अब बात उत्तर प्रदेश के शहर बिजनौर की करते हैं। यहाँ के किसान नेताओं ने तय किया है कि अगर उनके गांव के सामने कोई मजदूर पैदल जाता दिखाई दे तो उसे किसी पेड़ की छांव में अथवा किसी खाली स्कूल में रोक कर जलपान अवश्य ही कराया जाएगा। जैसे कावड़ यात्रियों को भंडारे लगाकर हाथ जोड़-जोड़ कर किसान खाना खिलाते हैं उसी भाव से इन मजदूरों को भी भोजन परोसा जा रहा है। बिजनौर के गांव खिरना में काफी संख्या में मजदूरों को किसानों का सहारा मिला। किसानों ने उनके खाने पीने, स्नान ध्यान से लेकर आराम तक का इंतजाम किया। दरअसल देश के कई इलाकों में किसान प्रवासी मजदूरों के लिए ढाल की तरह बने खड़े हैं। हाल में राजस्थान के एक गांव में मजदूरों ने एक स्कूल का जीर्णोद्वार कर चमका दिया क्योंकि वहां के किसान परिवारों ने उनको मेहमान की तरह ऐसी खातिरदारी की थी कि और इतना बेहतर खाने पीने का इंतजाम किया, कि उनको लगा कि अगर बिना कुछ किए धरे जाएंगे तो उनकी अंतरात्मा कोसेगी।
बेशक मौजूदा संकट का मुकाबला सरकार तब ही कर सकती है जब उसे सामाजिक संगठनों का भरपूर साथ मिले। समाज के अन्दर से ही मददग़ारों की फौज़ खड़ी हो गई। कोई इन श्रमिकों के लिए फलों का इंतज़ाम करता तो कोई दवाओं का,कोई चरण पादुकाएँ ले आता तो कोई मास्क और सेनिटाइज़र। ये सारे उदाहरण इस बात की गवाही हैं कि भारतीय समाज अब भी संवेदनशील और मानवीय है। वह दूसरों के कष्टों में खड़ा होता है। “सर्वेभवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया” उसके रग-रग में रचा-बसा है। हालांकि कोरोना का खतरा हर इंसान पर आ गया है, फिऱ भी हजारों लोग उन्हें सहारा दे रहे हैं, जो बिलकुल सड़क पर हैं। यही भारतीयता की पहचान है।
(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)


