राष्ट्र-चिंतन: संविधान व कानून का मुंह चिढ़ाती ‘‘ पत्थलगड़ी ‘‘

विष्णुगुप्त

जब ऐसे तत्वों पर, ऐसे बवाल पर, ऐसी हिंसा पर, ऐसी करतूत और ऐसी राजनीति पर सत्ता की वीरता उठती है तब अभिव्यक्ति की कथित स्वतंत्रा की प्रत्यारोपित आवाज उठने लगती है, असहिष्णुता का शोर उठने लगता है, नामी-गिरामी वकीलों की टीम खड़ी होकर न्यायपालिका तक दौड़ लगा देती है, फिर दुष्परिणाम सामने आता है, देश तोडक शक्तियों का विकास और प्रसार खतरनाक तौर पर सामने खड़ा हो जाता है, सरकारी की तरफ से उठी र्हइु वीरता भी स्थिर हो जाती है, इस प्रकार देश तोड़क शक्तियों को इंधन मिलता रहता है, उनकी साजिशों का श्रृखंला भी बढती जाती है, हमारी सुरक्षा एजेसियों की चुनौतियां भी खतरनाक ढंग से बढती ही जाती है। क्या यह सही नहीं है कि देश के अंदर में कोई एक नहीं बल्कि अनेकानेक देश तोड़क शक्तियों का विस्तार और अस्तित्व स्थापित है? क्या यह सही नहीं है कि आयातित संस्कृति के नाम पर देश का एक विखंडन हुआ है?
पत्थलगड़ी के नाम पर एक और देश तोड़क राजनीति, साजिश खतरनाक तौर पर विस्तार पा रही है, जिसके पीछे न केवल वोट की राजनीति है बल्कि विदेशी साजिश है, कुछ आयातित संस्कृतियों के खतरनाक और खूनी पंजे हैं। अभी-अभी झारखंड के अंदर पत्थलगड़ी की हिंसा ने देश को झकझोर कर रख दिया है, संदेश भी दिया गया कि यह तो अभी झांकी है, ऐसी हिंसा की आंधी आने वाली है, यह हिंसा सिर्फ झारखंड के अंदर ही नहीं बल्कि इस हिंसा का विस्तार छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात आदि राज्यों में होगी।
झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले में पत्थलगड़ी समर्थकों ने एक साथ नौ ग्रामीणो का अपहरण कर ,उन लोगों की वीभत्स हत्याएं की हैं। जिस वीभत्सता के साथ हत्याएं हुई हैं, उससे लगता है कि इन्हें हत्याओं और बवाल करने के प्रशिक्षण प्राप्त थे, अपहरण किये गये ग्रामीणों के पहले अंग भंग किये गये और उसके बाद उनके शरीर को जला दिया गया। मारे गये ग्रामीण पत्थलगड़ी के विरोधी थे और उनके पत्थलगड़ी कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार कर दिये थे। झारखंड के आदिवासी इलाके की स्थिति इतनी खतरनाक हो गयी है, इतनी हिंसक हो गयी हे कि पत्थलगड़ी कार्यक्रम में शामिल नहीं होने वाले ग्रामीणों को पत्थलगड़ी विरोधी मान लिया जाता है और उनकी हत्या के फरमान जारी कर दिये जाते हैं। झारखंड के आदिवासी इलाके से बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है। क्योकि पत्थलगड़ी इलाके में पुलिस और अर्द्धसैनिक बल के जवान भी जाने से डरते हैं, उपर से नक्सलवाद का खौफ होता है। कहने का अर्थ है कि पत्थलगड़ी प्रभावित क्षेत्रों में ग्रामीण स्वयं के बल पर सुरक्षा करने या फिर अपने घर-द्वार छोड़ने के लिए विवश हैं।
पत्थलगड़ी क्या है, पत्थरगढी की साजिशें क्या हैं? पत्थलगड़ी के पीछे कौन सी आयातित संस्कृति की रक्तरंजित भूमिका है, पत्थलगड़ी का केन्द्र विन्दु कहां है, पत्थलगड़ी के केन्द्र विन्दु से झारखंड तक यह पत्थलगड़ी कैसे पहुंची और इस पत्थलगड़ी को पहुंचाया कौन और क्या यह पत्थलगड़ी देश की एकता और अखंडता के लिए एक भीषण और रक्तरंजित खतरा है ? पत्थलगड़ी का केन्द्र विन्दु झारखंड नहीं बल्कि गुजरात है, गुजरात से इस साजिश को झारखंड में लाया गया है और अब इसका विस्तार सिर्फ झारखंड तक ही सीमित रहेगा,ऐसा नहीं है, इसका विस्तार अब छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश , कर्नाटक और उडीशा जैसे राज्यों में करने की योजना है। गुजरात जहां पर पत्थलगड़ी का केन्द्र विन्दु है वहां पर यह साजिश बहुत ज्यादा कामयाब नहीं हुई तो फिर इस प्रयोग को देश के अन्य भागों में करने की विदेशी साजिशें तेज हुई थी। यह भी सही है कि गुजरात में पत्थलगड़ी के माध्यम से धर्म परिवर्तन कराने और देश की एकता और अखंडता पर आंच लगाने जैसे कामों में इन्हें कामयाबी भी मिली है।
आदिवासी क्षेत्रों में गांव के बाहर एक बडा पत्थर जमीन में स्थापित कर दिया जाता है, इसे ही पत्थलगड़ी कहते हैं। इसका अर्थ यह हूआ कि जहां पर पत्थर स्थापित किया गया है उसके अंदर कोई सरकार का कर्मचारी, प्रशासन का कोई अधिकारी अंदर नहीं आ सकता है, सरकारी कर्मचारी और पदाधिकारी को गांव के अंदर आने के लिए आदिवासियों के प्रधान से अनुमति लेनी होगी, अनुमति नहीं लेने पर हिंसा का भागी बनना होगा। दरअसल आदिवासियो को संविधान की पांचवी अनुसूची को लेकर बरगलाया गया है, उनके दिमाग में हिंसा भरी गयी है, यह प्रत्यारोपित किया गया है संविधान की पाचवीं अनुसूची उन्हें अपना शासन चलाने की अनुमति देती है।
पत्थलगड़ी के साजिशकर्ता यह भी कहते हैं कि हम सरकार को कोई टैक्स नहीं देंगे, हम सरकार द्वारा निर्धारित कोई पहचान पत्र नहीं रखेंगे, जमीन के कागजात भी नहीं रखेंगे, राज्य सरकार ही नहीं बल्कि केन्द्रीय सरकार भी हम से कोई टैक्स नहीं वसूल सकती है, न्यायपालिका भी हमारे संबंध में कोई फैसला नहीं दे सकती है, हम अपराध का फैसला खुद करेंगे, हम खुद जेल बनायेंगे, हम खुद अपना जज चुनेंगे? यह सब सिर्फ फरमान तक ही सीमित नही है बल्कि इस फरमान को अंजाम तक पहुंचाने के लिए हत्याओं का दौर भी चल रहा है। सबसे बडी बात यह है कि आदिवासियो के पास पहले परमपरागत हथियार थे, वे सिर्फ तीर-धनुष का उपयोग करते थे पर अब उनके पास आधुनिक हथियार भी आ गये हैं? आधुनिय हथियार उन्हें कौन उपलब्ध करा रहा है? इस पर भी अभी तक कोई खुलासा नहीं हुआ है।
पत्थलगड़ी विरोधी गुजरात के आदिवासी नेता विजय गमीत कहते हैं कि यह आदिवासी अधिकारों की लड़ाई नहीं है, यह सिर्फ और सिर्फ विदेशी देश तोड़क साजिशें हैं और इस साजिश को अंजाम देने के लिए विदेशो से धन आता है, गोरे लोग विदेश से आदिवासी इलाके में आकर देश के खिलाफ भड़काते हैं। पहले विदेशी देश तोड़क शक्तियां कहती हैं कि आपका हिन्दू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है, आपका कोई भी भगवान नहीं है, फिर ये देश तोड़क विदेशी संस्कृतियां अपने धर्म की महता स्थापित करते हैं। विजय गमीत आगे कहते हैं कि ऐसी ही एक साजिश गुजरात में हुई थी जहां पर राज्य और देश के अधिकार को नहीं मानने का फरमान जारी हुआ था पर यह फरमान कुछ ही दिनो में दम तोड़ चुका था। यद्यपि गुजरात में यह प्रयोग असफल हो गया था फिर भी विदेशी देश तोड़क शक्तियां इस साजिश को गुजरात से बाहर छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश और झारखंड राज्य में ले जाने और पत्थलगड़ी को ढाल बना कर धर्म परिवर्तन कराने तथा हिंसा का बाजार लगाने में जरूर कामयाब हुई हैं। गुजरात में भी आदिवासियों के बीच में ऐसे ही हथकंडों से बडे पैमाने पर धर्म परिवर्तन कराये गये हैं।
झारखंड के अंदर में पत्थलगड़ी के नाम पर डर-भय का वातावरण बनाने, पत्थलगड़ी के नाम पर गैर आदिवासियों को भगाने, पुलिस और अर्द्ध सैनिक बलों पर हमला कराने के खेल बहुत पहले से सक्रिय है-जारी है। झारखंड के अंदर में पत्थरगढी राजनीति भी बवाल पर भी कम नहीं काटी है। पूर्व की रधुवर दास सरकार ने इस पर प्रारंभ में उदासीनता बरती थी। जब पत्थलगड़ी कानून और संविधान का मुंह चिढाने लगी तब रधुवर दास सरकार ने कार्यवाही की थी। पर बहुत लेट से सरकार के कदम उठे थे। उसके पहले ही पत्थलगड़ी की साजिशें पूरे राज्य में बवाल काट चुकी थी, अपने खूनी पंजें पसार चुकी थी, विदेशी शक्तियों की देश तोडक साजिशें कामयाब हो चुकी थी।
राज्य सत्ता बदल गयी। अहंकार और व्यक्तिवाद की रघुवर दास की सरकार का पतन हुआ, नई हेमंत सोरेन की सरकार आयी। हेमंत सोरेन को जीताने में विदेशी देश तोडक शक्तियों ने बडी भूमिका निभायी थी। एक विदेशी संस्कृति के पोषक ने यह कह कर तहलका मचा दिया था कि हमनें रघुवर दास की भाजपा सरकार को हराने और हेमंत सोरेन सरकार को जीताने और स्थापित करने के लिए विशेष प्रार्थना की थी। हेमंत सोरेन ने सरकार की बागडौर संभालने के तुरंत बाद ही पत्थलगड़ी की हिंसक गुनहगारों पर से मुकदमें वापस लेने की घोषणा की थी। इसका दुष्परिणाम कोई एक नहीं बल्कि नौ-नौ निर्दोष व्यक्तियो की हत्या है।
हमारे देश में कमजोरी यह है कि हम समय पर जागते ही नहीं है और न ही हम समय पर अपनी वीरता दिखाते हैं, हमारी राजनीति तब जागती है, हमारी सत्ता तब जागती है जब देश तोड़क शक्तियां देश की एकता और अखंडता को प्रभावित करने के लिए खतरनाक हो जाती हैं, शक्ति हासिल कर लेती हैं। ऐसा कश्मीर में हुआ, ऐसा असम में हुआ, नागालैंड, मनिपुर आदि में हुआ। अब ऐसी खतरनाक देश तोड़क समस्या झारखंड में ही उत्पन्न नही हुई हैं बल्कि अब यह समस्या अपने आगोश में छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश, उडीशा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे प्रदेशों को भी लेगी। इसलिए पत्थलगड़ी के नाम पर विदेशी देश तोड़क शक्तियों की पहचान कर उन्हें संविधान और कानून का पाठ पढाया जाना चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)