कभी सोचे ना थे, महादेव: अन्याय और आस्था पर भावुक कविता
कविता में अन्याय और दर्द की गहरी अभिव्यक्ति
“कभी सोचे ना थे, महादेव” एक भावनात्मक कविता है, जिसमें अन्याय, पीड़ा और आस्था का गहरा चित्रण किया गया है। कवि ने महादेव से संवाद के माध्यम से जीवन में आए कठिन समय, एकतरफा सजा और न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।
कभी सोचे ना थे, महादेव,
कि ऐसा दिन दिखेगा।
रहते तो हर पल ही हैं,
फिर भी खामोश रहना होगा।
न गुनाह पता, न जख्म, महादेव,
फिर भी सजा तय हो गया।
सोचते रहे कि आखिर हुआ है क्या,
और सजा सुना दिया गया।

समझ से मेरे तो ये परे है।
तू ही कुछ बता दो,
ये मैं कैसे अंधेरे में हूँ?
सुना तो मैं भी हूँ, महादेव,
कि एक हाथ से ताली नहीं बजती है।
यदि गुनाह, जख्म मेरा है,
तो उसकी भी भागीदारी है।
फिर ये सजा एकतरफा, महादेव,
ऐसा क्यों, कैसे हो गया?
कि वो न्यायकर्ता गलत था,
या उसका वो अपना निकला?
ये धरा अजीब हो गया है, महादेव,
अब यहाँ न्याय नियम से नहीं,
बल्कि भार देखकर होता है,
चाहे मुजरिम गलत रहे या सही।
खैर, कोई बात नहीं, महादेव,
मुझे तो आप पर भरोसा है।
चाहे जितना भी गलत करार दे कोई,
मुझे आप पर पूर्ण आशा है।

✍️ चुन्नू साहा, पाकुड़, झारखंड
