“उस दौर से इस दौर तक”: बाबा साहेब के संघर्ष की प्रेरक गाथा
दलित चेतना और संघर्ष को दर्शाती भावपूर्ण रचना
“उस दौर से इस दौर तक” कविता समाज के संघर्ष, पीड़ा और बदलाव की कहानी को प्रस्तुत करती है। यह रचना बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के योगदान और दलित समाज के उत्थान को भावनात्मक रूप से दर्शाती है।
राकेश कुमार पंवार
पत्थर की मूर्त से निकल कर, इंसान की दुनिया दिखाई थी।
उस दौर की यारों कथा सुनो, जिसने ये ठोकर खाई थी।।

उस दौर में झाँक के देखो यारों, जिसने ये अलख जगाई थी।।
किस्मत की लकीरें फीकी थीं, जब कंगुरा सूना था।
जीने को जिंदगी तो मिली थी, पर आशियाना सूना था।।
ना राम था, ना रहीम था, हर पल का रोना था।
भूख-प्यास मिटाने को, दूसरों के भरोसे जीना था।।
भीम जैसा सूरज अगर निकला ना होता,
दलितों के जीवन में ये उजाला ना होता।।
मर गए होते यूँ ही जुल्म सहकर,
अगर भीम जैसा रखवाला मिला ना होता।।
दलित समाज सुधारक को बाबा साहेब कहते हैं।
जलते दीपक बनकर सदा हमारे दिल में रहते हैं।।
अमीरों का दिया हर अत्याचार सहा था उसने,
फिर भी दो वक्त की रोटी भी कमा ना पाया था।।
अपनी गरीबी के आगे, वो बेबस नजर आया था।
फिर भी दो वक्त की रोटी भी कमा ना पाया था।।
फिर हुआ एक रोज चमत्कार इस धरती पर,
बनकर मसीहा, खुदा धरती पर उतर आया था।।
देश के लिये जिन्होंने विलास को ठुकराया था।
गिरे हुए को जिन्होंने स्वाभिमान सिखाया था।।
जिसने हम सबको तूफानों से टकराना सिखाया था।
देश का वो था अनमोल दीपक, जो बाबा साहब कहलाया था।।
(फाइल फोटो)
