29 साल की पूरी तरह स्वस्थ महिला को दी इच्छामृत्यु, दुनिया हैरान!
भारत में सख्त कानून, केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति
गाजियाबाद के हरीश राणा को 13 साल कोमा में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति मिलने और नीदरलैंड की 29 वर्षीय जोराया टेर बीक को मानसिक पीड़ा के आधार पर इच्छामृत्यु दिए जाने से इस संवेदनशील मुद्दे पर नई बहस छिड़ गई है।
नई दिल्ली: इच्छामृत्यु को लेकर एक बार फिर देश और दुनिया में बहस तेज हो गई है। गाजियाबाद के हरीश राणा, जो पिछले 13 वर्षों से कोमा में थे, उन्हें लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद सुप्रीम कोर्ट से पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति मिली। वहीं, इसके उलट नीदरलैंड की 29 वर्षीय जोराया टेर बीक को मानसिक पीड़ा के आधार पर इच्छामृत्यु की मंजूरी दे दी गई, जिससे कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
भारत में सख्त कानून, लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद मिली अनुमति
हरीश राणा का मामला भारत में इच्छामृत्यु की जटिल प्रक्रिया को दर्शाता है। उनके पिता को बेटे की इच्छामृत्यु के लिए करीब दो साल तक अदालतों के चक्कर लगाने पड़े। पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की सिफारिशों के आधार पर पैसिव यूथिनेशिया की अनुमति दी। भारत में केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु ही वैध है, वह भी तब जब मरीज के ठीक होने की कोई उम्मीद न हो।
यूरोप में अलग दृष्टिकोण, मानसिक पीड़ा भी माना गया आधार

क्या मरने का अधिकार भी मौलिक अधिकार है?
इन दोनों मामलों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या जीने का अधिकार, मरने के अधिकार को भी शामिल करता है। आलोचकों का मानना है कि मानसिक रूप से पीड़ित व्यक्ति हमेशा स्वतंत्र निर्णय लेने की स्थिति में नहीं होता, जबकि समर्थकों का कहना है कि असहनीय पीड़ा की स्थिति में व्यक्ति को अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए।
