Dumka News : श्रीमद् भागवत कथा में धूमधाम से मनाया गया श्रीकृष्ण जन्मोत्सव

कृष्ण जन्म के रहस्य और महत्व पर विस्तृत चर्चा

Dumka News : श्रीमद् भागवत कथा में धूमधाम से मनाया गया श्रीकृष्ण जन्मोत्सव

दुमका में श्रीमद् भागवत कथा के चौथे दिन श्रीकृष्ण जन्मोत्सव भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया, जहां कथा वाचक ने सेवा, सुमिरन और संतोष का संदेश दिया।

दुमका : दुमका अंतर्गत हरनाकुण्डी रॉड जखापोखर के पास श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर कथा वाचक जयराम शरण ने भगवान श्री कृष्ण के प्राकट्य उत्सव (कृष्ण जन्म) का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया। कथा पांडाल उस समय गोकुल के रंग में रंग गया जब 'नन्द घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की' के जयकारों के साथ भगवान का जन्मोत्सव मनाया गया।

श्रद्धालुओं ने पुष्प वर्षा और नृत्य के साथ कान्हा के आगमन का स्वागत किया।कथा वाचक ने कृष्ण जन्म के आध्यात्मिक रहस्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब समाज में अधर्म, अत्याचार और अहंकार (कंस) अपनी पराकाष्ठा पर होता है, तब ईश्वर का अवतार होता है।उन्होंने बताया कि जैसे ही कृष्ण का जन्म हुआ, कारागार के दरवाजे स्वतः खुल गए और पहरेदार सो गए। यह इस बात का प्रतीक है कि जब हृदय में परमात्मा का प्राकट्य होता है, तो मोह-माया के बंधन स्वतः कट जाते हैं।

भगवान का आधी रात को प्रकट होना दर्शाता है कि घोर अज्ञान के अंधकार में भी ज्ञान की एक किरण पूरे संसार को आलोकित कर सकती है। कथा के दौरान कथा वाचक ने मनुष्य जीवन की सार्थकता पर विशेष विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि केवल सांस लेना जीवन नहीं है, बल्कि 'बोध' के साथ जीना ही वास्तविक जीवन है।

कथा व्यास ने समझाया कि वर्तमान समय में मनुष्य भौतिक सुखों के पीछे भाग रहा है, जिससे तनाव और अशांति बढ़ रही है। उन्होंने जीवन के तीन मुख्य स्तंभ सेवा, सुमिरन और संतोष बताए सेवा- दूसरों के प्रति दया भाव रखना। उन्होंने आध्यात्मिक सन्देश दिया की भौतिकता की अंधी दौड़ में 'सेवा, सुमिरन और संतोष' ही शांति का मार्ग है।वर्तमान समय में जहाँ मनुष्य तकनीक और भौतिक सुख-सुविधाओं के शिखर पर है, वहीं मानसिक शांति के मामले में वह उतना ही पीछे छूटता जा रहा है।

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हाल ही में आयोजित एक सत्संग कार्यक्रम में कथा वाचक ने जीवन जीने की सही दिशा निर्धारित करने पर बल दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक मनुष्य अपनी बाहरी दुनिया को सजाने के साथ-साथ अपनी आंतरिक दुनिया पर ध्यान नहीं देगा, तब तक तनाव और अशांति का अंत संभव नहीं है। कथा वाचक के इस संबोधन ने उपस्थित श्रद्धालुओं को जीवन के प्रति एक नया दृष्टिकोण दिया।

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उन्होंने अंत में कहा कि यदि हम इन तीन स्तंभों—सेवा, सुमिरन और संतोष—को अपने दैनिक व्यवहार में उतार लें, तो यह संसार ही स्वर्ग के समान आनंदमयी बन सकता है। असंतोष ही दुख की जननी है। जयराम शरण ने कहा कि हमें उपलब्ध संसाधनों के लिए ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए। 'संतोष' का अर्थ आलस नहीं, बल्कि जो हमारे पास है उसकी कद्र करना और उसमें सुखी रहना है।

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​भागदौड़ भरी जिंदगी में हम खुद को और अपने मूल स्रोत (ईश्वर) को भूल चुके हैं। दिन भर में कुछ समय एकांत में बैठकर परमात्मा का ध्यान करने से मन की एकाग्रता बढ़ती है और आत्मिक शक्ति प्राप्त होती है। सच्ची खुशी केवल खुद के लिए जीने में नहीं, बल्कि दूसरों के काम आने में है। जब हम नि:स्वार्थ भाव से किसी की मदद करते हैं, तो हमारे मन से नकारात्मकता दूर होती है और करुणा का जन्म होता है। कथा वाचक ने समझाया कि आज के युग में मनुष्य की इच्छाएं अनंत हो गई हैं।

हम उन चीजों के पीछे भाग रहे हैं जो केवल क्षणिक सुख देती हैं। इस अंधी दौड़ ने हमारे जीवन में तनाव  और अशांति को जन्म दिया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि शांति बाजार में बिकने वाली वस्तु नहीं, बल्कि भीतर से उपजा हुआ भाव है।सुमिरन-भागदौड़ भरी जिंदगी में कुछ समय परमात्मा के ध्यान के लिए निकालना। संतोष जो प्राप्त है, उसे पर्याप्त मानकर ईश्वर का धन्यवाद करना।मार्ग कठिन हो सकता है, लेकिन सत्य का मार्ग ही गंतव्य तक ले जाता है।जयराम शरण ने जोर देकर कहा कि सत्मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को शुरू में बाधाएं आ सकती हैं, लेकिन अंत में विजय और मानसिक शांति उसी की होती है।

उन्होंने युवाओं से विशेष आग्रह किया कि वे अपनी संस्कृति और संस्कारों को न छोड़ें। आगे कथा मे कथा वाचक ने संदेश दिया कि कृष्ण केवल इतिहास नहीं, बल्कि हमारे जीवन के सारथी हैं। यदि हम अपने जीवन की डोर उन्हें सौंप दें, तो संसार रूपी महाभारत को जीतना सरल हो जाएगा। चौथे दिन की कथा का विश्राम आरती और छप्पन भोग के प्रसाद वितरण के साथ हुआ।

Edited By: Anshika Ambasta

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