असम में झामुमो के चुनाव लड़ने से किसको होगा लाभ, पश्चिम बंगाल के मामले पर उठ रहे सवाल

कांग्रेस से गठबंधन न बनने पर झामुमो ने 21 सीटों पर उतारे उम्मीदवार

असम में झामुमो के चुनाव लड़ने से किसको होगा लाभ, पश्चिम बंगाल के मामले पर उठ रहे सवाल
हेमंत सोरेन (फाइल फोटो)

झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) द्वारा असम विधानसभा चुनाव में 21 सीटों पर चुनाव लड़ने के फैसले ने सियासी हलचल तेज कर दी है। कांग्रेस से गठबंधन न बनने के बाद पार्टी ने अकेले मैदान में उतरने का निर्णय लिया है।

सुनील सिंह

रांची : आखिरकार अंतिम समय में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने असम में 21 सीटों पर विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। पार्टी ने कांग्रेस से गठबंधन की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली। कांग्रेस झामुमो को 7 सीट से अधिक देने को तैयार नहीं हुई। कांग्रेस को पता है कि असम में झामुमो की कोई खास पकड़ नहीं है। इसलिए उसने 7 सीटों से अधिक देना उचित नहीं समझा। दोनों तरफ से बारगेनिंग हुई। लेकिन बात नहीं बनी। यह स्वाभाविक राजनीतिक स्थिति है कि जिस राज्य में जिस पार्टी का दबदबा रहता है वह अपने हिसाब से गठबंधन करती है और सहयोगी दलों को सीट देती है। 

अब सवाल उठता है कि असम में झामुमो के चुनाव लड़ने से कांग्रेस के साथ उसके रिश्ते पर क्या असर पड़ेगा? असम में चुनाव लड़ने से किसको फायदा होने वाला है? वोटों के बिखराव का लाभ किसको मिलेगा ? भाजपा, कांग्रेस या खुद झामुमो कोई असर डाल पाएगा। आखिर झामुमो की रणनीति क्या है। किस भूमिका में वहां नजर आएगी। सिर्फ चाय बागान में काम करने वाले झारखंड के आदिवासियों के भरोसे झामुमो को कितना वोट मिलने वाला है। आदिवासी वोटों पर झामुमो की नजर है। चाय बागान में काम करने वाले आदिवासियों को अपनी ओर करने के लिए भाजपा ने कई घोषणाएं की हैं। 

आदिवासियों का समर्थन इसके पहले के चुनाव में भाजपा और कांग्रेस को मिलता रहा है। अब झामुमो ने वहां एंट्री की है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन आदिवासियों के नेता के रूप में दूसरे प्रदेशों में भी स्थापित होना चाहते हैं। जहां-जहां आदिवासी हैं वहां उनकी नजर है। इसी उद्देश्य से उन्होंने असम में चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। हालांकि झामुमो ने फैसले में बहुत देर कर दी है। गठबंधन की आस में नामांकन के अंतिम दिन चुनाव मैदान में जाने का फैसला लिया है।
इधर, एक सवाल यह भी उठ रहा है कि झामुमो के चुनाव लड़ने से भाजपा को फायदा हो सकता है। वोटों का बिखराव होगा और इसका सीधा लाभ बीजेपी को मिलेगा। यदि इसका लाभ भाजपा को मिला तो कांग्रेस के साथ झामुमो के रिश्ते में दरार पड़ सकती है। कांग्रेस का एक खेमा यह मान रहा है कि हेमंत सोरेन अंदर से भाजपा को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से ही असम में चुनाव लड़ रहे हैं, क्योंकि वहां उनका कोई आधार नहीं है। सिर्फ चाय बागान में काम करने वाले आदिवासियों के नाम पर चुनाव लड़ने से कोई लाभ होने वाला नहीं है। झामुमो को कोई सीट मिलने वाली नहीं है। हेमंत सोरेन असम तो चले गए लेकिन पड़ोसी प्रदेश पश्चिम बंगाल जहां आदिवासियों की अच्छी खासी संख्या है वहां चुनाव लड़ने पर चुप क्यों है। इसके पीछे का रहस्य क्या है? असम में ओवैसी की भूमिका क्यों निभाना चाहते हैं। 

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झारखंड की राजनीति में मई में होने वाला राज्यसभा का चुनाव अहम है। दो सीटों पर चुनाव होना है। फिलहाल दोनों सीटों पर झामुमो- कांग्रेस गठबंधन की स्थिति मजबूत है। एक सीट पर कांग्रेस का दावा है। यह स्वाभाविक भी है। लेकिन अंतिम दोनों में भाजपा क्या खेल करती है और झामुमो क्या रुख रहता है इस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। इसलिए राज्यसभा का चुनाव झारखंड की राजनीति में टर्निंग पॉइंट हो सकता है।

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Edited By: Mohit Sinha
Mohit Sinha Picture

Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.

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