“बस देख लेंगे”: भारतीय टालमटोल संस्कृति पर तीखा व्यंग्य

“बस देख लेंगे”: भारतीय टालमटोल संस्कृति पर तीखा व्यंग्य

“बस देख लेंगे”: भारतीय टालमटोल संस्कृति पर तीखा व्यंग्य
डॉ आशुतोष प्रसाद (फाइल फोटो)

“बस देख लेंगे” शीर्षक यह व्यंग्यात्मक लेख भारतीय समाज में प्रचलित उस मानसिकता पर रोशनी डालता है, जहाँ समस्याओं का समाधान करने की बजाय उन्हें टालने की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है। घर के छोटे कामों से लेकर दफ्तर और राजनीति तक, यह तीन शब्दों का वाक्य अक्सर जिम्मेदारियों को आगे बढ़ाने का माध्यम बन जाता है।

“बस देख लेंगे।”

यह तीन शब्दों का वाक्य भारतीय आश्वासन का सार्वभौमिक प्रतीक है। इसमें समाधान भी है, टालमटोल भी; साहस भी है और सुविधाजनक अनिर्णय भी।

यह वाक्य इतना लचीला है कि हर परिस्थिति में फिट हो जाता है—जैसे एक ही चाबी से सारे ताले खुल जाएँ, या कम-से-कम खुलने का भरोसा बना रहे।

घर में नल टपक रहा है।
पत्नी कहती हैं—“प्लंबर बुला लीजिए।”
उत्तर आता है—“हाँ, बस देख लेंगे।”
नल टपकता रहता है, पर वाक्य अपनी जगह अडिग रहता है।

यह वाक्य समस्या का समाधान नहीं करता, समस्या को स्थगित करता है—सम्मानपूर्वक।

कार्यालय में फाइल अटकी है।
कर्मचारी पूछता है—“सर, यह कब तक हो जाएगा?”
सर गंभीर मुद्रा में कहते हैं—“देख लेंगे।”

यह ‘देख लेंगे’ सुनते ही कर्मचारी समझ जाता है कि अब फाइल का भाग्य ईश्वर के हाथ में है।

राजनीति में तो यह वाक्य अमरत्व को प्राप्त हो चुका है।
जनता पूछती है—“सड़क कब बनेगी?”
उत्तर—“देख लेंगे।”

यानी सड़क का भविष्य उज्ज्वल है, बस समय अस्पष्ट है।

“बस देख लेंगे” दरअसल हमारे निर्णय-भय का सभ्य संस्करण है।
हम सीधे ‘न’ नहीं कहना चाहते और ‘हाँ’ कहकर बंधना भी नहीं चाहते।

इसलिए बीच का रास्ता चुन लेते हैं—देख लेंगे।

यह वाक्य वादा नहीं, संभावना है।
यह आश्वासन नहीं, आशा का मसौदा है।

परीक्षा से पहले छात्र से पूछा जाए—“तैयारी हो गई?”
वह मुस्कराकर कहेगा—“देख लेंगे।”

इसमें आत्मविश्वास भी छिपा है और किस्मत पर भरोसा भी।
मानो प्रश्नपत्र उससे पूछेगा—“तुमने पढ़ा है?”
और वह उत्तर देगा—“बस, देख लेंगे।”

रिश्तों में भी यह वाक्य खूब चलता है।
कोई कहे—“कभी मिलते क्यों नहीं?”
उत्तर—“अरे, देख लेंगे।”

मुलाकात भविष्य के कोहरे में विलीन हो जाती है, पर संबंध की औपचारिकता बची रहती है।

यह वाक्य हमारी सामाजिक शिष्टता का सुरक्षा-कवच है।
सीधे मना कर देंगे तो सामने वाला आहत होगा।
स्पष्ट प्रतिबद्धता दे देंगे तो खुद बँध जाएँगे।

इसलिए ‘देख लेंगे’ कहकर हम दोनों से बच निकलते हैं।

कभी-कभी यह वाक्य आत्म-संवेदना का भी माध्यम बन जाता है।
हम खुद से कहते हैं—

“व्यायाम शुरू करेंगे।”
“नई भाषा सीखेंगे।”
“पुरानी किताबें पढ़ेंगे।”

और फिर जोड़ देते हैं—“देख लेंगे।”

यह ‘देख लेंगे’ हमारे संकल्पों की शीत-निद्रा है।
संकल्प सो जाते हैं, वाक्य जागता रहता है।

रोचक यह है कि ‘देख लेंगे’ का अर्थ हर व्यक्ति अपने हिसाब से समझता है।
किसी के लिए इसका अर्थ है—“अभी नहीं।”
किसी के लिए—“शायद कभी।”
और किसी के लिए—“कभी नहीं।”

फिर भी यह वाक्य इतना लोकप्रिय है, क्योंकि यह आशा को जीवित रखता है।

यह दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं करता, बस आधा खुला छोड़ देता है।
और आधा खुला दरवाज़ा, पूरी तरह बंद दरवाज़े से अधिक सुकून देता है।

पर जीवन की कुछ स्थितियाँ ऐसी भी होती हैं, जहाँ ‘देख लेंगे’ पर्याप्त नहीं होता।
वहाँ निर्णय चाहिए, स्पष्टता चाहिए, साहस चाहिए।

हर बार स्थगन संभव नहीं।

कभी-कभी नल बंद करना पड़ता है, फाइल पर हस्ताक्षर करने पड़ते हैं, सड़क बनानी पड़ती है और संबंध निभाने पड़ते हैं।

शायद ‘बस देख लेंगे’ का असली सौंदर्य तभी है, जब वह अस्थायी हो—स्थायी नीति नहीं।

यह वाक्य विश्राम हो सकता है, मंज़िल नहीं।

फिर भी, मान लीजिए आप यह निबंध पढ़कर सोच रहे हों—
“अच्छा लिखा है… पर इस पर कुछ कहेंगे?”

तो आप भी मन ही मन कह रहे होंगे—
“देख लेंगे।”

और मैं भी मुस्कुराकर यही कहूँगा—
हाँ, कभी न कभी…
बस, देख लेंगे।

✍️ डॉ. आशुतोष प्रसाद

Edited By: Mohit Sinha

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