Hindi opinion article
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Read More... दुनिया वैसी ही बन जाती है, जैसी हम चाहते हैं
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By Mohit Sinha
दुनिया वैसी ही बन जाती है, जैसी हम चाहते हैं—राजीव थेपड़ा का यह विचारपरक लेख इंसानी इच्छाओं, लालच, अहंकार, हिंसा, शोषण और सामाजिक विसंगतियों के बीच आत्ममंथन का आह्वान करता है। “बस देख लेंगे”: भारतीय टालमटोल संस्कृति पर तीखा व्यंग्य
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By Mohit Sinha
“बस देख लेंगे” शीर्षक यह व्यंग्यात्मक लेख भारतीय समाज में प्रचलित उस मानसिकता पर रोशनी डालता है, जहाँ समस्याओं का समाधान करने की बजाय उन्हें टालने की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है। घर के छोटे कामों से लेकर दफ्तर और राजनीति तक, यह तीन शब्दों का वाक्य अक्सर जिम्मेदारियों को आगे बढ़ाने का माध्यम बन जाता है। 