दुनिया वैसी ही बन जाती है, जैसी हम चाहते हैं
राजीव थेपड़ा ने समाज, इंसानी इच्छाओं और आत्ममंथन पर उठाए गंभीर सवाल
दुनिया वैसी ही बन जाती है, जैसी हम चाहते हैं—राजीव थेपड़ा का यह विचारपरक लेख इंसानी इच्छाओं, लालच, अहंकार, हिंसा, शोषण और सामाजिक विसंगतियों के बीच आत्ममंथन का आह्वान करता है।
राजीव थेपड़ा
फिर सुबह हो चुकी है और सूरज की चकाचौंध किरणें धरती के आधे हिस्से पर रोशनी बनकर फैल चुकी हैं! पंछीगण अपने-अपने डेरों से निकलकर अन्न की खोज में दूर-दूर निकल चुके हैं और तरह-तरह के पशु भी सड़कों, मैदानों और यहाँ-वहाँ फैल चुके हैं! सभी को महज भोजन चाहिए और बस इसी एक चीज भर के लिए वे जीते हैं! मगर मनुष्य नाम का एक प्राणी भी इसी धरती पर है, जो भोजन से इतर तरह-तरह की चीजों को चाहता है—तरह-तरह के साधन, तरह-तरह के मनोरंजन, तरह-तरह के व्यंजन, तरह-तरह का देह-सुख, असीम प्रेम, अनंत वासना और अथाह धन... बस ऐसी ही कुछ अभीप्साएँ हैं आदमी की, जिनके लिए वह जीता है और जिनके लिए औरों के जीने को हराम करता है!!


आदमी का जर-जरा और जमीन का एक अंतहीन वासना भरा हुआ तुच्छ कार्यक्रम आदमी की सारी सुबहों को भयानक काली रात बनाए हुए है! उसकी हर वक्त की यौनिकता और यौन-संबंधों से लबालब दिन उसे आँखें भी खोलने देता है या नहीं, यह हमें नहीं पता!!... मगर उसकी इस वासना के शिकार, इस जर-जरा और जमीन की वासना के शिकार तथा उसके दर्पपूर्ण दंभ भरे अहंकार के शिकार चूँकि अन्य लाखों-करोड़ों लोग बनते हैं, इसलिए यह बात किसी की निजता की न रहकर सार्वजनिक हो जाती है, क्योंकि प्रश्न कुछ लोगों के सुबह के खेल से शुरू होने वाले आचरण से बहुत से अन्य लोगों के जीवन में हमेशा के लिए अँधेरी काली रात के फैल जाने का हो जाता है! ऐसी भयानक काली रात, जो न जीने देती है और न ही मरने!! और ऐसी काली रातों में विवश और कहर भरा जीवन जीते हुए लोगों के लिए ऐसे राक्षस लोग सदा भयानक अट्टहास करते हुए प्रतीत होते हैं!!
आज फिर सुबह आ गई है। सुबह रोज आती थी, सुबह कल भी आएगी और सुबह तो आती ही रहेगी! मगर सुबह के साथ सही में उजाला भी आ ही जाए, ये कतई जरूरी नहीं! नहीं है ना? सुबह का अखबार हर बीते हुए कल की सुबह-दोपहर-शाम और रात का आईना है! इस आईने में कल के समूचे दिन की कुछ घटनाएँ आदमी के अच्छेपन से ज्यादा उसके शैतानी दिमाग की सूरत ज्यादा दिखाई देती है, न सिर्फ कुछ लोगों की शैतानी हरकतों में, बल्कि हम जैसे खुद को शरीफ समझने वाले लोगों की हरकतों/कार्यों में भी...!! मगर इस बात के विस्तार में न जाकर मैं हम सबसे यही पूछ लेता हूँ ना कि क्यों जी, आप खुद के भीतर कभी झाँकते भी हो क्या कि सुबह से रात तलक किस तरह गुजारते हो आप अपना दिन...!! क्या वो दिन सचमुच पवित्रता से भरा होता है? क्या आप तरह-तरह से किसी को नहीं ठगते?
क्या आप किसी की भी लानत-मलामत नहीं करते? क्या आप सचमुच सब लोगों के साथ समभाव और सद्भाव से रहते हैं? क्या आप सचमुच नौकर-चाकर-दाई-मजदूर-कुली-ठेले-रिक्शे-ऑटो-खलासी-ड्राइवर आदि-आदि सबसे उचित और सम्माननीय व्यवहार करते हो? क्या आप सचमुच अपने परिवार-समाज का हित-पोषण करते हो?
इस सुबह आज का सवाल यही है कि क्या सचमुच हम खुद भी वैसे ही हैं, जैसी कि दुनिया हम अपने लिए चाहते हैं, चाहते रहे हैं!? बस अभी थोड़ी देर में यह सुबह क्रमशः दोपहर-शाम और रात में परिणत होकर खत्म हो जाने वाली है और जैसा कि हम जानते हैं कि काल अखंडित है, इस अखंडित काल की कल की सुबह और फिर परसों-नरसों-तरसों की सुबहें आने वाली हैं! तो फिर हमने क्या सोचा है अपने खुद के बारे में और थोड़ा बहुत ही सही, समाज के बारे में?? खुद को और समाज को ठीक वैसा ही छोड़ देना है या कुछ बदल भी डालना है, यानी कि अब खुद में सचमुच कोई उजाला भी भरना है या छोड़ देना है सारी आने वाली सुबहों को काली-स्याह के भयानक अँधेरे के भरोसे!!
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.
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