तुलसी जयंती पर विशेष: सब में रमते हैं तुलसी के राम

तुलसी जयंती पर विशेष: सब में रमते हैं तुलसी के राम

योगेश कुमार गोयल

विक्रमी संवत् के अनुसार प्रतिवर्ष श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त और महान् ग्रंथ ‘श्री रामचरितमानस’ के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास की जयंती मनाई जाती है, जो इसबार 15 अगस्त को मनाई जा रही है। विक्रमी संवत् 1554 में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के राजापुर नामक गांव में जन्मे तुलसीदास के पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। तुलसीदास के बचपन का नाम रामबोला था और कहा जाता है कि जन्म के समय वह रोये नहीं थे तथा उनके मुख में पूरे बत्तीस दांत थे। उनकी माता की मृत्यु हो जाने पर पिता ने उन्हें अशुभ मानकर बचपन में ही त्याग दिया था, जिसके बाद दासी ने उनका पालन- पोषण किया लेकिन जब दासी ने भी उनका साथ छोड़ दिया तो उनका जीवन बेहद कष्टमय हो गया था।

दरअसल अधिकांश लोग उन्हें अशुभ मानकर उन्हें देखते ही अपने द्वार बंद कर लिया करते थे लेकिन तुलसीदास ने जीवन की इन मुसीबतों से हार मानने के बजाय तमाम कठिनाइयों का डटकर मुकाबला किया। उनका विवाह दीनबंधु पाठक की अत्यंत विदुषी पुत्री रत्नावली से हुआ था। तुलसीदास रत्नावली पर अत्यंत मुग्ध थे और उससे बहुत प्रेम करते थे। एक दिन की बात है, रत्नावली अपने मायके गई हुई थी लेकिन तुलसीदास को उसकी याद सता रही थी। रात का समय था, मूसलाधार बारिश हो रही थी, ऐसे मौसम में भी तुलसीदास उफनती नदी पार कर पत्नी से मिलने देर रात उसके मायके जा पहुंचे। रत्नावली अपने पति तुलसीदास के इस कृत्य पर बहुत लज्जित हुई और ताना मारते हुए तुलसीदास को कहा:-

हाड़ मांस को देह मम, तापर जितनी प्रीति।

तिसु आधो जो राम प्रति, अवसि मिटिहि भवभीति।

अर्थात् जितना प्रेम मेरे इस हाड़-मांस के शरीर से कर रहे हो, यदि उतना ही प्रेम प्रभु श्रीराम से किया होता तो भवसागर पार हो गए होते। पत्नी द्वारा लज्जित अवस्था में मारे गए ताने ने तुलसीदास के जीवन की दिशा ही बदल डाली। उसके बाद उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया और वे भगवान राम की भक्ति में रम गए। उसी दौरान एक दिन स्वामी नरहरिदास उनके गांव आए, जिन्होंने तुलसीदास को दीक्षा देते हुए आगे के जीवन की राह दिखाई। उसके बाद तुलसीदास ने रामकथा में ही सुखद समाज की कल्पना करते हुए इसे आदर्श जीवन का मार्ग दिखाने का माध्यम बना लिया। गुरु नरहरिदास से शिक्षा-दीक्षा लेने के बाद ही उन्हें रामचरित मानस लिखने की प्रेरणा मिली।

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित इसी ‘रामचरित मानस’ को आज भी देशभर में एक महान् ग्रंथ के रूप में बड़े ही आदर और सम्मान से साथ देखा जाता है। तुलसीदास जी ने वैसे अपने जीवनकाल में कवितावली, दोहावली, हनुमान बाहुक, पार्वती मंगल, रामलला नहछू, विनयपत्रिका, कवित्त रामायण, बरवै रामायण, वैराग्य संदीपनी इत्यादि कुल 12 पुस्तकों की रचना की किन्तु उन्हें सर्वाधिक ख्याति रामचरित मानस के जरिये ही मिली। हालांकि जब उन्होंने रामचरित मानस की रचना की थी, उस जमाने में संस्कृत भाषा का प्रभाव बहुत ज्यादा था, इसलिए आंचलिक भाषा में होने के कारण शुरूआत में इसे मान्यता नहीं मिली थी लेकिन सरल भाषा में होने के कारण कुछ ही समय बाद यह ग्रंथ जन-जन में बहुत लोकप्रिय हुआ।

कुछ विद्वान तुलसीदास को सम्पूर्ण रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का अवतार भी मानते हैं। महर्षि वाल्मीकि द्वारा संस्कृत में रचित ‘रामायण’ को आधार मानकर गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना सरल अवधी भाषा में की थी। अवधी खासकर उत्तर भारत में जनसाधारण की भाषा है, इसीलिए सरल अवधी भाषा में होने के कारण रामचरित मानस अत्यधिक प्रसिद्ध हो गई। यही कारण है कि गोस्वामी तुलसीदास को जन-जन का महाकवि और कविराज माना जाता है। वे दुनिया के पहले ऐसे कवि है, जो अपनी रचनाओं को ही अपने माता-पिता कहते थे।

अपने काव्य में तुलसीदास जी ने आसावरी, जैती, कान्हरा, कल्याण, भैरव, भैरवी, बिलावल, सारंग, विभास, बसंत, दंडक, केदार, धनाश्री, सोरठ, ललित, नट, तोड़ी, सूहो, मलार, गौरी, मारू, चंचरी, रामकली आदि बीस से भी अधिक रागों का प्रयोग किया है किन्तु इनमें से आसावरी, जैती, कान्हरा, बिलावल, केदार, धनाश्री तथा सोरठ के प्रति उनकी खास रुचि रही। मारू, बिलावत, कान्हरा, धनाश्री में वीर भाव के पद, विभास, सूहो विलास और तोड़ी में श्रृंगार के पद, भैरव, धनाश्री और भैरवी में उपदेश संबंधी पद तथा ललित, नट और सारंग में समर्पण संबंधी पदों की रचना हुई है। तुलसीदास द्वारा रचित अनेक चौपाइयां सूक्तियां बन गई हैं।

तुलसीदास जी का सम्पूर्ण जीवन राममय रहा और अपने महाकाव्य रामचरित मानस के जरिये उन्होंने भगवान श्रीराम की मर्यादा, करुणा, दया, शौर्य, साहस और त्याग जैसे सद्गुणों की व्याख्या करते हुए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम का स्वरूप दिया। रामचरित मानस के जरिये उन्होंने समूची मानव जाति को श्रीराम के आदर्शों से जोड़ते हुए श्रीराम को जन-जन के राम बना दिया था, इसलिए भी तुलसीदास को जन-जन के कवि कहा जाता है।

रामचरित मानस के जरिये मनुष्य के संस्कार की कथा लिखकर उन्होंने इस रामकाव्य को भारतीय संस्कृति का प्राण तत्व बना दिया। तुलसीदास के अनुसार तुलसी के राम सब में रमते हैं और वे नैतिकता, मानवता, कर्म, त्याग द्वारा लोकमंगल की स्थापना करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने रामचरित मानस को जरिया बनाकर समस्त भारतीय समाज को भगवान श्रीराम के रूप में ऐसा दर्पण दिया है, जिसके सामने हम बड़ी आसानी से अपने गुण-अवगुणों का मूल्यांकन करते हुए अपनी मर्यादा, करुणा, दया, शौर्य, साहस और त्याग का आकलन कर श्रेष्ठ इंसान बनने की ओर प्रवृत्त हो सकते हैं।

राम भक्ति के पर्याय बने गोस्वामी तुलसीदास ने सत्य और परोपकार को सबसे बड़ा धर्म तथा त्याग को जीवन का मंत्र मानते हुए अपनी रचनाओं के माध्यम से असत्य, पाखंड, ढोंग और अंधविश्वासों में डूबे समाज को जगाने का हरसंभव प्रयास किया। उनका मत था कि हमें बहुत सोच-समझकर अपने मित्र बनाने चाहिए क्योंकि इंसान का जैसा संग-साथ होगा, उसका आचरण और व्यक्तित्व भी वैसा ही होगा क्योंकि संगत का असर अप्रत्यक्ष-प्रत्यक्ष, देर-सवेर, चेतन व अवचेतन मन और जीवन पर अवश्य पड़ता है। उनका कथन है कि सत्संग का प्रभाव व्यापक है और इसकी महिमा किसी से छिपी नहीं है। सत्संग के प्रभाव से कौआ कोयल तथा बगुला हंस बन जाता है। संतों का संग किए बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती और सत्संग तभी मिलता है, जब प्रभु श्रीराम की कृपा होती है।

बिनु सत्संग बिबेक न होई।

राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।

तुलसीदास जी का कथन था कि संत और असंत दोनों एक ही संसार में एक साथ जन्म लेते हैं लेकिन दोनों के गुण जल में ही उत्पन्न होने वाले कमल और जोंक की भांति भिन्न होते हैं। दरअसल जहां कमल का दर्शन मन को परम सुख प्रदान करता है, वहीं जोंक शरीर से चिपककर खून चूसती है। ठीक इसी प्रकार संत इस संसार से उबारने वाले होते हैं जबकि असंत कुमार्ग पर धकेलने वाले। दोनों ही संसार रूपी इसी समुद्र में उत्पन्न होते हैं, फिर भी संत अमृत की धारा हैं तो असंत मदिरा की शाला।

उपजहिं एक संग जग माहीं।

जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं।

सुधा सुरा सम साधु असाधू।

जनक एक जग जलधि अगाधू।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

Edited By: Samridh Jharkhand

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