Opinion: प्रधानमंत्री संग्रहालय ने मांगे नेहरू के दस्तावेज, कांग्रेस की चुप्पी पर विवाद
आखिर गांधी परिवार इन दस्तावेजों को क्यों नहीं लौटाना चाहता?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान जैसे वरिष्ठ सदस्य भी मौजूद रहे. सूत्रों के मुताबिक, बैठक में तय किया गया कि अगर गांधी परिवार दस्तावेज नहीं लौटाता, तो संस्था कानूनी रास्ता अख्तियार करेगी.
देश की राजनीति एक बार फिर पंडित नेहरू की विरासत को लेकर गर्म है, लेकिन इस बार मामला भावनाओं का नहीं, दस्तावेज़ों का है. प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय सोसाइटी (PMML) ने कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को पत्र लिखकर वह 51 डिब्बे वापस मांगे हैं जिनमें देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निजी पत्र, दस्तावेज और अभिलेख हैं. ये वही दस्तावेज़ हैं जिन्हें इंदिरा गांधी ने 1971 में सार्वजनिक संग्रहालय को सौंपा था, लेकिन 2008 में यूपीए सरकार के दौर में सोनिया गांधी के पास भेज दिया गया. अब सवाल यह है कि क्या गांधी परिवार इतिहास को रोककर रखना चाहता है? और अगर ये दस्तावेज़ सार्वजनिक महत्व के हैं, तो क्या इन पर सिर्फ परिवार का अधिकार हो सकता है?पीएमएलएल की हालिया बैठक में इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा हुई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान जैसे वरिष्ठ सदस्य भी मौजूद रहे. सूत्रों के मुताबिक, बैठक में तय किया गया कि अगर गांधी परिवार दस्तावेज नहीं लौटाता, तो संस्था कानूनी रास्ता अख्तियार करेगी. इससे पहले भी फरवरी 2024 में इसी विषय पर विचार हुआ था और अब इसे लेकर स्पष्ट कानूनी राय मांगी जा चुकी है.
यह भी खुलासा हुआ है कि इन दस्तावेज़ों में पंडित नेहरू द्वारा एडविना माउंटबेटन, अल्बर्ट आइंस्टीन, जयप्रकाश नारायण, पद्मजा नायडू, विजया लक्ष्मी पंडित, अरुणा आसफ अली और बाबू जगजीवन राम जैसे नेताओं को लिखे गए पत्र शामिल हैं. इन पत्रों में उस समय की राजनीति, कूटनीति और निजी संवादों की झलक मिलती है, जो भारतीय इतिहास को समझने के लिए अत्यंत मूल्यवान माने जा रहे हैं. दिल्ली के तीन मूर्ति मार्ग स्थित प्रधानमंत्री संग्रहालय के 15,600 वर्ग मीटर परिसर में अब देश के सभी प्रधानमंत्रियों से जुड़ा दस्तावेजी खजाना संरक्षित किया जा रहा है. लेकिन नेहरू के इन पत्रों की अनुपस्थिति न केवल ऐतिहासिक शोध के लिहाज से एक बड़ी कमी है, बल्कि इसे लेकर राजनीतिक विवाद भी गहराता जा रहा है.

यहां एक और बिंदु विचारणीय है. अगर ये दस्तावेज़ निजी थे, तो 1971 में इंदिरा गांधी ने उन्हें सार्वजनिक संस्थान को क्यों सौंपा? और अगर वो निर्णय सही था, तो 2008 में यूपीए सरकार के समय उन्हें चुपचाप वापस क्यों ले जाया गया? क्या यह सिर्फ भावनात्मक फैसला था या कोई रणनीतिक कदम?पीएमएलएल अब यह भी तय कर चुकी है कि भविष्य में किसी भी दस्तावेज को संग्रहालय में शामिल करने के लिए गोपनीयता की कोई शर्त मान्य नहीं होगी. संस्था का तर्क है कि इतिहास को छुपाकर नहीं, पारदर्शिता से ही संरक्षित किया जा सकता है.
फिलहाल कांग्रेस की ओर से इस मुद्दे पर कोई बयान नहीं आया है. सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों ही चुप्पी साधे हुए हैं. लेकिन अगर अदालत में मामला पहुंचता है और दस्तावेज़ सार्वजनिक करने का आदेश आता है, तो यह कांग्रेस के लिए एक नैतिक और राजनीतिक संकट खड़ा कर सकता है. दूसरी ओर, अगर अदालत गांधी परिवार के हक में फैसला देती है, तो यह सरकार की पारदर्शिता की नीति पर सवाल खड़े करेगा.इस पूरे विवाद ने नेहरू की विरासत को एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बना दिया है. लेकिन यह केवल विरासत की लड़ाई नहीं है, यह उस विश्वास की लड़ाई भी है जो जनता अपने इतिहास, अपने दस्तावेजों और अपने लोकतंत्र से करती है.अब फैसला अदालत को करना है कि देश का इतिहास बंद पेटियों में रहेगा या देश के हर नागरिक की नज़र के सामने खुलेगा.
संजय सक्सेना, वरिष्ठ पत्रकार
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