कैसी है सरकार? — व्यवस्था और भ्रष्टाचार पर तीखी सामाजिक कविता
जनता के भरोसे और हकीकत का टकराव
राजेश पाठक की कविता “कैसी है सरकार?” वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर तीखा सवाल उठाती है। कविता में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था की कमजोरी, महिलाओं की सुरक्षा, राजनीतिक अवसरवाद और आम जनता की परेशानियों को मार्मिक शब्दों में व्यक्त किया गया है।
कल नेता झोपड़यों में थे,
महल हुआ तैयार
ऐसी-वैसी नहीं अगर
तो कैसी है सरकार!

करते जो व्यभिचार
ऐसी-वैसी नहीं अगर
तो कैसी है सरकार!
बहू-बेटियों की इज्जत से
होता है खिलवाड़
ऐसी-वैसी नहीं अगर
तो कैसी है सरकार!
दफ्तर-दफ्तर जाकर देखा
दिखा है भ्रष्टाचार
ऐसी-वैसी नहीं अगर
तो कैसी है सरकार!
पैसे हो तो काम बने
ना हो तो सब बेकार
ऐसी-वैसी नहीं अगर
तो कैसी है सरकार!
कल जो कुर्सी पर आए
आज खरीदे कार
ऐसी-वैसी नहीं अगर
तो कैसी है सरकार!
चुनना हो जब रिक्त पदों पर
चुने नहीं होनहार
ऐसी-वैसी नहीं अगर
तो कैसी है सरकार!
जब सहस्त्र हों छात्र जहां
पर शिक्षक हैं दो-चार
ऐसी-वैसी नहीं अगर
तो कैसी है सरकार!
धरती के भगवान कहूं पर
करते सब व्यापार
ऐसी-वैसी नहीं अगर
तो कैसी है सरकार!
डर लगता जब अपने घर में
जाऊं किसके द्वार
ऐसी-वैसी नहीं अगर
तो कैसी है सरकार!
कलम की ताकत मंद पडी़
चमक रही तलवार
ऐसी-वैसी नहीं अगर
तो कैसी है सरकार!
दल-बदलू को गले लगाने
को हरदम तैयार
ऐसी-वैसी नहीं अगर
तो कैसी है सरकार!
पैसा तो अब भी घिसता है
हुआ आठ से चार
ऐसी-वैसी नहीं अगर
तो कैसी है सरकार!
दुश्मन पर तो वार करे
मगर आर ना पार
ऐसी-वैसी नहीं अगर
तो कैसी है सरकार!
काम करे इक बार मगर
कहे उसे सौ बार
ऐसी-वैसी नहीं अगर
तो कैसी है सरकार!
बाहर से आजाद हुए
अंदर की दरकार
ऐसी-वैसी नहीं अगर
तो कैसी है सरकार!
जो विरोध कर देता उस पर
होता आज प्रहार
ऐसी-वैसी नहीं अगर
तो कैसी है सरकार!
मुंह पर हो पैबंद तो उनसे
करने लगती प्यार
ऐसी-वैसी नहीं अगर
तो कैसी है सरकार!
कवि : राजेश पाठक
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.
