30 साल जेल में गुजारे, 20 रुपये रिश्वत का था आरोप… बरी होते ही अगले दिन मौत
अहमदाबाद: गुजरात से एक ऐसी घटना सामने आई है जो न्याय व्यवस्था की कमियों को उजागर करती है। महज 20 रुपये रिश्वत के आरोप में फंसे एक पूर्व पुलिस कांस्टेबल ने 30 साल तक कानूनी जंग लड़ी, निर्दोष साबित हुए, लेकिन अगले ही दिन उनकी मौत हो गई।
घटना का पूरा विवरण

2004 में सेशंस कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराया। चार साल की सश्रम कारावास और 3 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। तीन अन्य पुलिसकर्मियों को भी सजा हुई, जिनकी नौकरी चली गई। लेकिन बाबूभाई ने हार नहीं मानी। उन्होंने उसी साल गुजरात हाईकोर्ट में अपील दाखिल की।
लंबी कानूनी लड़ाई
अपील 22 साल तक लंबित रही। वकील नितिन गांधी ने गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभासों का हवाला दिया। अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में नाकाम रहा। आखिरकार, 4 फरवरी 2026 को हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया। बाबूभाई को पूरी तरह बरी कर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि गवाहों के बयान अविश्वसनीय हैं।
फैसले के बाद बाबूभाई ने अपने वकील से कहा, "मेरी जिंदगी से यह कलंक धुल गया। अब भगवान मुझे ले भी जाएं तो कोई गम नहीं।" वे बेहद खुश थे।
ट्रेजिक अंत
लेकिन खुशी ज्यादा देर न टिकी। 5 फरवरी को नींद में हार्ट अटैक से उनकी मौत हो गई। वकील ने बताया कि फैसले के अगले दिन फोन किया तो पता चला कि वे चल बसे। शुभचिंतक दुखी हैं कि थोड़ा और समय मिला होता तो उन्हें न्याय की खुशी देख पाते।
न्याय में देरी का सबक
यह मामला दिखाता है कि न्याय में देरी न्याय से इंकार ही है। 30 साल की लड़ाई के बाद मिली बरीआदगी का मजा ही न ले पाए। ऐसे केसों से सिस्टम में सुधार की जरूरत साफ झलकती है
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