Blue Sparrow Missile: अंतरिक्ष से हमला करने वाली इजरायल की खतरनाक मिसाइल
नेशनल डेस्क: तेहरान और तेल अवीव के बीच तनाव की आग अब पूरे मध्य पूर्व को भस्म करने पर उतारू हो चुकी है। 28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका के संयुक्त अभियान में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या कर दी गई। यह हमला इतना सटीक और घातक था कि खामेनेई के आधिकारिक आवास पर 30 से अधिक मिसाइलें दागी गईं, जिनमें इजरायल की अत्याधुनिक 'ब्लू स्पैरो' मिसाइल का प्रमुख हाथ था। इस घटना ने न सिर्फ ईरान को सदमे में डाल दिया, बल्कि क्षेत्रीय शक्तियों के बीच 'आर-पार की जंग' को नई ऊंचाई दे दी।

ईरान ने जवाबी कार्रवाई में कई अरब देशों पर हमले बोल दिए और अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर यह 'ब्लू स्पैरो' मिसाइल है क्या, जो अंतरिक्ष की ऊंचाइयों से मौत बरसा सकती है? और क्या भारत जैसी उभरती शक्ति के पास भी ऐसी तकनीक मौजूद है?

इजरायल की 'ब्लू स्पैरो' कोई साधारण हथियार नहीं, बल्कि एक एडवांस्ड एयर-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसे लड़ाकू विमानों से छोड़ा जाता है। द टेलीग्राफ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, इसकी रेंज करीब 2,000 किलोमीटर है, जो इसे लंबी दूरी के संवेदनशील लक्ष्यों के लिए आदर्श बनाती है। मिसाइल की लंबाई लगभग 6.5 मीटर और वजन 1.9 टन के आसपास होता है, लेकिन इसकी असली ताकत इसकी उड़ान पथ में छिपी है। लॉन्च होने के बाद यह बैलिस्टिक ट्रैजेक्टरी पर चलती है, जो पृथ्वी के वातावरण के किनारे तक ले जाती है। वहां से यह एक री-एंट्री व्हीकल को अलग करती है, जो हाइपरसोनिक स्पीड पर लक्ष्य की ओर झपट पड़ता है। यही वजह है कि इसे 'स्पेस मिसाइल' या 'अंतरिक्ष से आई मौत' कहा जाता है। खामेनेई पर हमले में इसी तकनीक का इस्तेमाल हुआ, जहां मिसाइल ने इराक के ऊपर से गुजरते हुए ईरान पहुंची। पश्चिमी इराक में इसके मलबे के टुकड़े मिलने से यह साफ हो गया कि हमला इराकी हवाई क्षेत्र के रास्ते किया गया था।

इस मिसाइल की घातकता को समझने के लिए फोर्ब्स की रिपोर्ट पर नजर डालें, जहां डिफेंस एनालिस्ट्स का कहना है कि 'स्पैरो' परिवार की यह वैरिएंट एयरक्राफ्ट को एयर-डिफेंस सिस्टम्स से दूर रखते हुए भी भारी किलेबंदी वाले ठिकानों पर प्रहार करने की क्षमता देती है। मूल रूप से यह सिस्टम एयर-डिफेंस टेस्टिंग के लिए डिजाइन किया गया था, जो सोवियत स्कड मिसाइलों की नकल पर आधारित है। 2008 में AFP की एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि इजरायल की आर्मामेंट डेवलपमेंट अथॉरिटी ने इसे विकसित किया। 'ब्लू स्पैरो' 'स्पैरो' परिवार का हिस्सा है, जिसमें 'ब्लैक स्पैरो' और 'सिल्वर स्पैरो' भी शामिल हैं। अंतरिक्ष की ऊंचाई से लौटते हुए इसकी स्पीड इतनी तेज होती है कि दुश्मन के पास इसे रोकने का ज्यादा वक्त ही नहीं बचता। यही वजह है कि इसे बेहद गोपनीय और संवेदनशील मिशनों—जैसे खामेनेई की हत्या—के लिए चुना जाता है। इजरायल ने इस हथियार को अपनी रक्षा रणनीति का अभिन्न अंग बना लिया है, जो अब ईरान के साथ चल रहे संघर्ष में निर्णायक साबित हो रहा है।

ईरान-इजरायल युद्ध के इस नए अध्याय में भारत का नाम भी चर्चा में आ गया है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत ने भले ही 'ब्लू स्पैरो' को सीधे तौर पर अधिग्रहित न किया हो, लेकिन इसी तकनीक पर आधारित 'ROCKS' (क्रिस्टल मेज 2) मिसाइल को अपनी वायुसेना में शामिल कर लिया है। अप्रैल 2024 में भारतीय लड़ाकू विमान से इसका सफल परीक्षण किया गया था, जो देश की एयर-लॉन्च्ड बैलिस्टिक क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम था। ऊपर से, भारत और इजरायल के बीच 'गोल्डन होराइजन' मोबाइल एयर-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (ALBM) को लेकर गहन बातचीत चल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया इजरायल दौरे के दौरान इसकी पेशकश की गई, जिसकी अनुमानित रेंज 1,500 से 2,000 किलोमीटर है। यह मिसाइल भी 'स्पैरो' परिवार की ही तकनीक पर बनी है, जो भारत को क्षेत्रीय खतरों से निपटने में नई ताकत देगी। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे सहयोग से भारत न सिर्फ अपनी रक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में भी अपनी भूमिका निभाएगा।

इस पूरे घटनाक्रम ने मध्य पूर्व की भू-राजनीति को हिला दिया है। ईरान की जवाबी कार्रवाइयों से अमेरिका और उसके सहयोगी घिरे नजर आ रहे हैं, जबकि इजरायल अपनी सैन्य श्रेष्ठता साबित करने पर तुला है। लेकिन सवाल वही है—क्या यह संघर्ष कभी थमेगा? या 'ब्लू स्पैरो' जैसी तकनीकें इसे और लंबा खींच देंगी? आने वाले दिनों में इन सवालों के जवाब मिलेंगे, लेकिन फिलहाल दुनिया सांस थामे इस जंग को देख रही है।
(यह रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय मीडिया स्रोतों—जैसे द टेलीग्राफ, फोर्ब्स और AFP पर आधारित है। अपडेट्स के लिए बने रहें।)
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