संस्कृति का प्रतीक संकट में: झारखण्ड में हाथी और मानव का टकराव
किसानों पर दोहरी मार: आर्थिक नुकसान और मानसिक तनाव
झारखण्ड में मानव–हाथी संघर्ष केवल वन्यजीव समस्या नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिक संकट बन चुका है। खनन, वन क्षरण, जल संकट और हाथी कॉरिडोर के अवरोध ने इस संघर्ष को गहराया है। यह लेख विकास और पर्यावरण संतुलन की अनिवार्यता को रेखांकित करता है।
भारत में एशियाई हाथी केवल एक वन्यजीव प्रजाति नहीं है; वह भारतीय संस्कृति, आस्था और जैव विविधता की निरंतरता का प्रतीक है। प्राचीन शिलालेखों से लेकर लोककथाओं और धार्मिक प्रतीकों तक, हाथी हमारी सामूहिक चेतना का हिस्सा रहा है। किंतु आधुनिक भारत की विकास-यात्रा ने इस विराट जीव को उसके पारंपरिक आवास से विस्थापित कर दिया है।

संकट का विस्तार: आंकड़ों से परे एक त्रासदी- वन विभाग और विभिन्न स्वतंत्र अध्ययनों के अनुसार झारखण्ड में लगभग 650 से 750 जंगली हाथी विचरण करते हैं। ये हाथी मुख्यतः राज्य के दक्षिणी, मध्य और पश्चिमी वन क्षेत्रों में फैले हैं। पिछले एक दशक में 300 से अधिक लोगों की मृत्यु हाथी–मानव संघर्ष में दर्ज की गई है। औसतन हर वर्ष 30 से 40 लोगों की जान जाती है। यदि राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो भारत में प्रति वर्ष लगभग 400 से 500 मानव मृत्यु हाथियों के साथ संघर्ष में होती हैं।
यह आँकड़ा इस तथ्य को रेखांकित करता है कि समस्या केवल किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के विकास मॉडल और भूमि उपयोग नीति से गहराई से जुड़ी हुई है। झारखण्ड में हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि प्रतिवर्ष हाथियों के आक्रमण से प्रभावित होती है। धान, मक्का, गन्ना और सब्ज़ी जैसी फसलें हाथियों को आकर्षित करती हैं। सैकड़ों कच्चे मकान ढह जाते हैं। आर्थिक नुकसान की वास्तविक राशि सरकारी मुआवजा आंकड़ों से कहीं अधिक है, क्योंकि अनेक घटनाएँ दर्ज ही नहीं हो पातीं।
भौगोलिक परिदृश्य: संघर्ष के केंद्र में जिले- झारखण्ड के कई जिले इस संकट के प्रत्यक्ष गवाह हैं। राजधानी रांची के ग्रामीण अंचलों से लेकर खूंटी और गुमला के वन क्षेत्रों तक हाथियों की आवाजाही और मानव बस्तियों का फैलाव एक-दूसरे से टकरा रहे हैं। लोहरदगा और हजारीबाग जैसे क्षेत्रों में वन विखंडन और रेल मार्गों की उपस्थिति ने जोखिम बढ़ाया है।
कई बार रेल दुर्घटनाओं में हाथियों की मृत्यु हुई है, जो इस संघर्ष की दूसरी त्रासदी को उजागर करती है। सूखा-प्रवण पलामू में जल स्रोतों की कमी हाथियों को मानव बस्तियों की ओर धकेलती है। वहीं खनिज संपदा से समृद्ध पूर्वी सिहभूम ,प० सिहभूम और सराइकेला- खरसावाँ में खनन गतिविधियों ने जंगलों को खंडित कर दिया है। ये सभी जिले ऐतिहासिक हाथी कॉरिडोर का हिस्सा रहे हैं, जो झारखण्ड को ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ से जोड़ते हैं।
जब ये कॉरिडोर बाधित होते हैं, तो हाथी वैकल्पिक रास्तों की तलाश में गाँवों और खेतों की ओर मुड़ते हैं। संघर्ष की जड़ें: विकास और पारिस्थितिकी का असंतुलन-1. वन क्षेत्र का क्षरण खनन, सड़क निर्माण, औद्योगिक परियोजनाएँ और अवैध अतिक्रमण ने झारखण्ड के वन क्षेत्र को खंडित कर दिया है। खुली खदानों ने भूमि की संरचना बदली है और प्राकृतिक जल निकासी प्रणाली को प्रभावित किया है। 2. हाथी कॉरिडोर का अवरोध ऐतिहासिक प्रवासी मार्गों पर बस्तियाँ, रेलवे लाइनें और राजमार्ग बन गए।
हाथियों की स्मृति और प्रवास पद्धति पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित होती है; जब ये मार्ग बंद होते हैं, तो संघर्ष अपरिहार्य हो जाता है। 3. जलवायु परिवर्तन और जल संकट- अनियमित वर्षा और बढ़ती गर्मी ने जल स्रोतों को प्रभावित किया है। जंगलों में जल की कमी हाथियों को खेतों और तालाबों की ओर आकर्षित करती है। 4. कृषि पैटर्न में बदलाव- धान और मक्का जैसी ऊर्जा-समृद्ध फसलें हाथियों को आकर्षित करती हैं। एकल फसल प्रणाली (मोनोक्रॉपिंग) ने जोखिम को और बढ़ाया है। 5. जनसंख्या दबाव- ग्रामीण आबादी का विस्तार वन सीमांत क्षेत्रों तक हो चुका है।
भूमि उपयोग में यह परिवर्तन संघर्ष की तीव्रता को बढ़ाता है। सामाजिक और आर्थिक प्रभाव- हाथी–मानव संघर्ष का सबसे बड़ा भार छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ता है। आर्थिक संकट: फसल नष्ट होने पर किसान कर्ज़ में डूब जाते हैं। मानसिक तनाव: रात भर पहरा देना, लगातार भय में जीना।
लेखक :- विजय शंकर नायक, वरिष्ठ नेता, झारखण्ड कांग्रेस
Susmita Rani is a journalist and content writer associated with Samridh Jharkhand. She regularly writes and reports on grassroots news from Jharkhand, covering social issues, agriculture, administration, public concerns, and daily horoscopes. Her writing focuses on factual accuracy, clarity, and public interest.
