हिमंता बनाम हेमंत, बदले की भावना या विस्तार की राजनीति

हिमंता सरमा की रणनीति का जवाब देने उतरे हेमंत सोरेन

हिमंता बनाम हेमंत, बदले की भावना या विस्तार की राजनीति
असम में हेमंत बनाम हिमंता की सियासी टक्कर

असम विधानसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा की एंट्री ने सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के इस कदम को जहां कुछ लोग बदले की राजनीति मान रहे हैं, वहीं अन्य इसे पार्टी के विस्तार की रणनीति बता रहे हैं।

सुनील सिंह

रांची: झारखंड मुक्ति मोर्चा ने असम विधानसभा चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन लगातार चुनाव प्रचार कर रहे हैं।  झामुमो के 16 उम्मीदवार चुनाव मैदान में है। पार्टी ने 21 उम्मीदवारों की सूची जारी की थी, लेकिन पांच उम्मीदवार अलग-अलग वजहों से चुनाव मैदान से हट गए हैं। झामुमो के असम में चुनाव लड़ने के फैसले पर पहले दिन से ही सवाल उठ रहे हैं। आखिर हेमंत सोरेन झारखंड से सीधे असम कैसे पहुंच गए। इसके पीछे की क्या कहानी और वजह है। असम में क्या मिलने वाला है। यह बदले की भावना से लिया गया फैसला है या विस्तारवाद की राजनीति। चर्चा अब इसी की हो रही है। 

2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान को चुनाव प्रभारी और असम के मुख्यमंत्री हिमंता  सरमा को सह प्रभारी बनाया था। हिमंता ने पूरी चुनावी रणनीति झारखंड में रहकर बनाई। वह दो महीने तक झारखंड में जम रहे। जबरदस्त कैंपेन किया। सबसे अधिक नुकसान उन्होंने झामुमो को  पहुंचा। झारखंड मुक्ति मोर्चा के कद्दावर नेता और हेमंत सोरेन के करीबी पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन को भाजपा में शामिल कराकर एक बड़ा झटका दिया। दूसरे दलों के कई नेताओं को भाजपा में शामिल कराया। शतरंज की हर चाल चली, भले सफलता नहीं मिली। हेमंत सोरेन को खूब परेशान किया।

अब बारी हेमंत सोरेन की है। असम विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही झारखंड मुक्ति मोर्चा ने वहां चुनाव की तैयारी शुरू कर दी। असम की चाय बागान में काम करने वाले अधिकांश आदिवासी झारखंड के हैं। हेमंत सोरेन की नजर इन्हीं आदिवासी वोटरों पर है। चुनाव की घोषणा होते ही झामुमो ने चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। कांग्रेस से गठबंधन की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी तो अकेले चुनाव मैदान में कूद गया। झामुमो का उद्देश्य वहां भाजपा को नुकसान पहुंचना और हिमंता से बदला लेना है। लेकिन असम में हिमंता से बदला लेना कठिन है, क्योंकि वह राजनीति के बहुत बड़े खिलाड़ी और रणनीतिकार हैं। मतदाताओं पर मजबूत पकड़ है। 

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लेकिन बड़ा सवाल यह है कि बदले की भावना से लड़ा जा रहा है चुनाव का नतीजा कहीं उल्टा न पड़ जाए। क्योंकि आदिवासी वोटों के बंटवारे का लाभ भाजपा को मिलने की संभावना जताई जा रही है। इससे कांग्रेस को नुकसान होगा। वहां मुख्य मुकाबले में कांग्रेसी ही है। ऐसे में झामुमो का चुनाव लड़ना कई सवालों को जन्म देता है। चुनाव में झामुमो  कुछ हजार वोटों को छोड़कर बहुत कुछ मिलने वाला नहीं है। इधर, कांग्रेस ने असम में झामुमो के प्रभाव को कम करने के लिए झारखंड कांग्रेस के सभी आदिवासी नेताओं को चुनाव प्रचार में लगा दिया है। 

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कुछ लोग झामुमो के असम में चुनाव लड़ने को उसके विस्तारवाद की राजनीति से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि हेमंत सोरेन आदिवासी प्रदेशों में चुनाव लड़कर अपनी पार्टी का विस्तार करना चाहते हैं। वह राष्ट्रीय फलक पर झामुमो को देखना चाहते हैं। इसीलिए असम में चुनाव लड़ रहे हैं। लेकिन यदि विस्तार की राजनीति करना है तो फिर झामुमो झारखंड से सटे पश्चिम बंगाल में चुनाव क्यों नहीं लड़ रहा है। पश्चिम बंगाल में तो आदिवासियों की संख्या अच्छी खासी है। पश्चिम बंगाल के कई जिले बृहद झारखंड के हिस्से में आते हैं। फिर यहां से परहेज क्यों। सिर्फ असम में चुनाव लड़ने से पार्टी का विस्तार हो जाएगा क्या। 

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चुनाव परिणाम आने के बाद ही यह तय होगा कि असम में झामुमो को क्या मिला। असम में चुनाव लड़ने से कांग्रेस के साथ झामुमो के रिश्ते में दरार पड़ी है। इसका असर अभी से दिखने लगा है झामुमो प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने कांग्रेस को विषैला सांप तब कह दिया है। इधर झारखंड कांग्रेस प्रभारी के राजू ने कल पहली बार सरकार के खिलाफ जमकर भड़ास निकली। खनन माफिया, सरकार के कामकाज और जिलों के डीसी की भूमिका पर सवाल उठाए। इसे समझा जा सकता है की बात अब आगे बढ़ रही है। इसका असर गठबंधन पर पड़ सकता है।

Edited By: Mohit Sinha
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Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.

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