Opinion: होर्मुज की लहरों में डूबता सुपर पावर का गुमान और हार को जीत बताता ट्रंप का प्रलाप
होर्मुज जलडमरूमध्य पर तनाव से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अस
फारस की खाड़ी में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। इस विश्लेषण में बताया गया है कि कैसे युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि रणनीति और धैर्य से जीता जाता है।
इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि युद्ध के मैदान में जब बंदूकें खामोश होने लगती हैं, तब झूठ के नगाड़े सबसे जोर से बजते हैं। आज फारस की खाड़ी के तपते पानी में जो कुछ घट रहा है, वह किसी हॉलीवुड थ्रिलर से कम नहीं है, लेकिन इस पटकथा का अंत वैसा नहीं है जैसा वॉशिंगटन के व्हाइट हाउस में बैठकर लिखा गया था। युद्ध में कौन जीत रहा है और कौन हार रहा है, इसे आंकने का पैमाना कभी भी मिसाइलों की संख्या या मलबे का ढेर नहीं होता। इसका सबसे सटीक पैमाना यह है कि शांति की भीख सबसे पहले किसने मांगी। आज जब हम अप्रैल 2026 की दहलीज पर खड़े हैं, तो दुनिया देख रही है कि जिस ईरान को प्रतिबंधों की बेड़ियों में जकड़कर घुटनों पर लाने का दावा किया गया था, वह आज तनकर खड़ा है और दुनिया का स्वयंभू थानेदार अब एग्जिट गेट की तलाश में हाथ-पांव मार रहा है।

आज मिडिल ईस्ट के रणक्षेत्र में डोनाल्ड ट्रंप वही गलती दोहरा रहे हैं जो कभी पाकिस्तानी जनरलों ने की थी। 28 फरवरी को जब ईरान के शीर्ष नेतृत्व पर हमला हुआ, तो अमेरिका को लगा कि तेहरान ताश की गड्डी की तरह बिखर जाएगा। लेकिन वे भूल गए कि जिस देश ने 40 साल से प्रतिबंधों की आग में खुद को तपाया हो, उसके लिए मिसाइलों की गड़गड़ाहट किसी उत्सव से कम नहीं होती। ईरान ने पलटवार किया और ऐसा किया कि पूरे मध्य पूर्व में फैले अमेरिकी अड्डों की सुरक्षा की कलई खुल गई। आज होर्मुज स्ट्रेट बंद है। दुनिया की रगों में दौड़ने वाला तेल अब ईरान की मर्जी का मोहताज है। वह देश जो कल तक दूसरे देशों को सुरक्षा की गारंटी बेचता था, आज अपने ही सैनिकों की जान बचाने के लिए उन रास्तों को ढूंढ रहा है जो तेहरान तक जाते हों।
ट्रंप का आज का अंदाज बिल्कुल मई 2025 के पाकिस्तान जैसा है। कैमरों के सामने आकर वे अपनी जीत के कसीदे पढ़ रहे हैं, ट्रुथ सोशल पर कैप्स लॉक में अपनी ताकत का बखान कर रहे हैं, लेकिन जमीन की हकीकत उनके दावों का मजाक उड़ा रही है। जब आप हार रहे होते हैं, तो आपकी भाषा में अहंकार और हताशा का एक अजीब मिश्रण घुल जाता है। अमेरिका आज पाकिस्तान के जरिए ईरान को 15 सूत्रीय प्रेम पत्र भेज रहा है, लेकिन तेहरान ने साफ कर दिया है कि वह किसी सेल्समैन से बात नहीं करेगा। ईरान की शर्तें साफ हैं होर्मुज पर उसका नियंत्रण होगा, अमेरिकी फौजें इलाका खाली करेंगी और नुकसान की भरपाई वॉशिंगटन को करनी होगी। ये शर्तें किसी हारे हुए राष्ट्र की नहीं, बल्कि उस खिलाड़ी की हैं जिसने सामने वाले की पूरी बिसात उलट दी है।
मिडिल ईस्ट में अमेरिका की विफलता केवल सैन्य नहीं, बल्कि रणनीतिक और नैतिक भी है। जिस रडार और एयर डिफेंस के भरोसे अमेरिका अपनी धौंस जमाता था, वे आज मलबे के ढेर में तब्दील हो चुके हैं। अरब देश, जो कभी अमेरिका की छत्रछाया में खुद को सुरक्षित महसूस करते थे, अब नए समीकरणों की तलाश में हैं। सऊदी अरब का यूक्रेन के साथ डिफेंस डील करना इस बात का सीधा प्रमाण है कि अब दुनिया को ट्रंप के कार्ड्स की असलियत समझ आ गई है। जब घर का मुखिया ही चोरों से अपनी रक्षा न कर पाए, तो परिवार के बाकी सदस्य नए रक्षक ढूंढने लगते हैं। आज वही स्थिति अमेरिका की है।
सबसे दिलचस्प भूमिका पाकिस्तान की है, जो अपनी फटीहाली को कूटनीतिक अवसर में बदलने की कोशिश कर रहा है। वह देश जिसने खुद अपनी नाक कटवाई थी, आज अमेरिका और ईरान के बीच बिचौलिए की भूमिका में डॉलर बटोरने के सपने देख रहा है। लेकिन ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस खेल का हिस्सा नहीं बनेगा। ईरान जानता है कि वक्त उसके साथ है। वह चुप है, शांत है और अपने लक्ष्यों के प्रति अडिग है। उसकी यह खामोशी वॉशिंगटन की बेचैनी को और बढ़ा रही है। जब आपके पास खोने के लिए कुछ न बचा हो, तो आप सबसे खतरनाक योद्धा बन जाते हैं। ईरान आज उसी स्थिति में है।
कार्ल मार्क्स ने सच ही कहा था कि इतिहास खुद को दोहराता है, पहले एक त्रासदी के रूप में और फिर एक मजाक के रूप में। ऑपरेशन सिंदूर पाकिस्तान के लिए त्रासदी थी, और आज फारस की खाड़ी में अमेरिका जो कर रहा है, वह एक वैश्विक मजाक बनकर रह गया है। ट्रंप अब एक सुरक्षित रास्ता ढूंढ रहे हैं जिससे वे अपनी साख बचा सकें, लेकिन ईरान उन्हें वह मौका देने के मूड में नहीं है। वह होर्मुज का पूरा टोल वसूलने के बाद ही चैन से बैठेगा। यह युद्ध मिसाइलों से नहीं, बल्कि सब्र और हौसले से जीता जा रहा है। और फिलहाल, जीत का सेहरा तेहरान के सिर बंधता दिख रहा है, जबकि वॉशिंगटन की चमकती वर्दी पर धूल और हार की कालिख साफ देखी जा सकती है। गड्ढे आज भी वहीं हैं, चाहे वो रावलपिंडी के एयरफील्ड पर हों या ट्रंप की विदेश नीति के सीने पर। सच तो यही है कि सुपरपावर का गुमान अब फारस की खाड़ी की लहरों में दफन हो चुका है।

अजय कुमार,
वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ ( उ. प्र.)
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.
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