Opinion: होर्मुज की लहरों में डूबता सुपर पावर का गुमान और हार को जीत बताता ट्रंप का प्रलाप
होर्मुज जलडमरूमध्य पर तनाव से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अस
फारस की खाड़ी में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। इस विश्लेषण में बताया गया है कि कैसे युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि रणनीति और धैर्य से जीता जाता है।
इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि युद्ध के मैदान में जब बंदूकें खामोश होने लगती हैं, तब झूठ के नगाड़े सबसे जोर से बजते हैं। आज फारस की खाड़ी के तपते पानी में जो कुछ घट रहा है, वह किसी हॉलीवुड थ्रिलर से कम नहीं है, लेकिन इस पटकथा का अंत वैसा नहीं है जैसा वॉशिंगटन के व्हाइट हाउस में बैठकर लिखा गया था। युद्ध में कौन जीत रहा है और कौन हार रहा है, इसे आंकने का पैमाना कभी भी मिसाइलों की संख्या या मलबे का ढेर नहीं होता। इसका सबसे सटीक पैमाना यह है कि शांति की भीख सबसे पहले किसने मांगी। आज जब हम अप्रैल 2026 की दहलीज पर खड़े हैं, तो दुनिया देख रही है कि जिस ईरान को प्रतिबंधों की बेड़ियों में जकड़कर घुटनों पर लाने का दावा किया गया था, वह आज तनकर खड़ा है और दुनिया का स्वयंभू थानेदार अब एग्जिट गेट की तलाश में हाथ-पांव मार रहा है।
इस पूरी कहानी को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे मुड़कर साल 2025 के उस ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को देखना होगा, जिसने उपमहाद्वीप के सैन्य इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया। भारत ने जब अपनी सीमा पार कर आतंकवाद के फनों को कुचला, तो वह केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि एक संदेश था। वह संदेश यह था कि शक्ति प्रदर्शन चीखने-चिल्लाने से नहीं, बल्कि सटीक प्रहार से होता है। पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम जब ताश के पत्तों की तरह ढह रहा था और भारतीय विमान आकाश में अपनी मर्जी से चित्रकारी कर रहे थे, तब रावलपिंडी के जनरलों ने पहली बार शांति का राग अलापा था। वह हार की तड़प थी जिसे जीत के पदकों के पीछे छिपाने की नाकाम कोशिश की गई। आसिम मुनीर का खुद को ‘फील्ड मार्शल’ घोषित कर देना वैसा ही था जैसे कोई डूबता हुआ आदमी खुद को समंदर का राजा कह दे। लेकिन गड्ढे झूठ नहीं बोलते। सैटेलाइट की तस्वीरों ने वह सच दुनिया के सामने रख दिया था जिसे पाकिस्तान की पीआर मशीनरी दबाना चाहती थी।

सबसे दिलचस्प भूमिका पाकिस्तान की है, जो अपनी फटीहाली को कूटनीतिक अवसर में बदलने की कोशिश कर रहा है। वह देश जिसने खुद अपनी नाक कटवाई थी, आज अमेरिका और ईरान के बीच बिचौलिए की भूमिका में डॉलर बटोरने के सपने देख रहा है। लेकिन ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस खेल का हिस्सा नहीं बनेगा। ईरान जानता है कि वक्त उसके साथ है। वह चुप है, शांत है और अपने लक्ष्यों के प्रति अडिग है। उसकी यह खामोशी वॉशिंगटन की बेचैनी को और बढ़ा रही है। जब आपके पास खोने के लिए कुछ न बचा हो, तो आप सबसे खतरनाक योद्धा बन जाते हैं। ईरान आज उसी स्थिति में है।
कार्ल मार्क्स ने सच ही कहा था कि इतिहास खुद को दोहराता है, पहले एक त्रासदी के रूप में और फिर एक मजाक के रूप में। ऑपरेशन सिंदूर पाकिस्तान के लिए त्रासदी थी, और आज फारस की खाड़ी में अमेरिका जो कर रहा है, वह एक वैश्विक मजाक बनकर रह गया है। ट्रंप अब एक सुरक्षित रास्ता ढूंढ रहे हैं जिससे वे अपनी साख बचा सकें, लेकिन ईरान उन्हें वह मौका देने के मूड में नहीं है। वह होर्मुज का पूरा टोल वसूलने के बाद ही चैन से बैठेगा। यह युद्ध मिसाइलों से नहीं, बल्कि सब्र और हौसले से जीता जा रहा है। और फिलहाल, जीत का सेहरा तेहरान के सिर बंधता दिख रहा है, जबकि वॉशिंगटन की चमकती वर्दी पर धूल और हार की कालिख साफ देखी जा सकती है। गड्ढे आज भी वहीं हैं, चाहे वो रावलपिंडी के एयरफील्ड पर हों या ट्रंप की विदेश नीति के सीने पर। सच तो यही है कि सुपरपावर का गुमान अब फारस की खाड़ी की लहरों में दफन हो चुका है।

अजय कुमार,
वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ ( उ. प्र.)
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.
