विकास की रफ्तार के साथ बढ़ता मौत का आंकड़ा: झारखंड की सड़कों पर संकट
2021 से 2024 तक 19,551 दुर्घटनाओं का भयावह सच
तेज़ विकास के साथ झारखंड में सड़क दुर्घटनाएँ एक गंभीर सामाजिक संकट बन चुकी हैं। हर साल हजारों लोग असमय जान गंवा रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि ओवरस्पीडिंग, दोपहिया वाहन हादसे, ब्लैक स्पॉट और आपात चिकित्सा सेवाओं की कमी इस त्रासदी के प्रमुख कारण हैं।
झारखंड, जिसे भारत का उभरता औद्योगिक और खनिज प्रमुख राज्य कहा जाता है, आज अपने तेज़ विकास के साथ एक भयावह दुर्घटना-सत्य से भी जूझ रहा है — सड़क दुर्घटनाओं में लगातार वृद्धि और बढ़ती मौतें। यह सिर्फ दुर्घटनाओं की संख्या नहीं, बल्कि लोकतंत्र और प्रशासन की प्राथमिकताओं में जाकर एक चेतावनी की घंटी बजाता है। झारखण्ड, जिसे खनिज संपदा और प्राकृतिक संसाधनों का प्रदेश कहा जाता है, आज एक और भयावह पहचान से जूझ रहा है — बढ़ती सड़क दुर्घटनाएँ और उनमें हो रही असामयिक मौतें।

झारखण्ड जैसे मध्यम आकार के राज्य में भी स्थिति चिंताजनक है। हाल के वर्षों में राज्य में प्रति वर्ष लगभग 4,000 से अधिक सड़क दुर्घटनाएँ दर्ज हो रही हैं, जिनमें 2,500 से अधिक लोगों की मौत होती है। यह संख्या कई जिलों की कुल वार्षिक मृत्यु दर से भी अधिक है। राजधानी रांची, औद्योगिक शहर जमशेदपुर, कोयला क्षेत्र धनबाद और इस्पात नगरी बोकारो — इन सभी प्रमुख शहरों और उनसे जुड़े राष्ट्रीय राजमार्गों पर दुर्घटनाओं की दर तेजी से बढ़ी है।
ताज़ा डेटा: एक विशाल समस्या का पैमाना
सबसे हालिया आंकड़ों के अनुसार, झारखण्ड में 2021 से 2024 तक कुल 19,551 सड़क दुर्घटनाएँ दर्ज हुईं।
2021 में 3,871,
2022 में 5,174,
2023 में 5,315,
और 2024 में 5,191 दुर्घटनाएँ हुईं।
इन आंकड़ों को राज्य के परिवहन मंत्री ने विधानसभा में लिखित रूप से साझा किया है। राष्ट्रीय तुलना में भी स्थिति चिंताजनक है। भारत में 2000 से 2025 के बीच लगभग 32 लाख लोग सड़कों पर अपनी जान गंवा चुके हैं, और अकेले झारखंड में अनुमानित 82,200 मौतें हुई हैं। और एक और महत्वपूर्ण तथ्य — 2023 में झारखंड में कुल 5,316 दुर्घटनाओं में 4,130 लोगों की मौत हुई, जबकि सिर्फ 3,586 लोग घायल हुए। अर्थात, इस वर्ष मौतें घायल होने वालों से भी ज़्यादा रहीं — एक बेहद गंभीर संकेत।
ये संख्याएँ न केवल बड़े पैमाने पर मानवीय जीवन की हानि दिखाती हैं, बल्कि संकेत देती हैं कि दुर्घटनाएँ और उनकी घातकता का ग्राफ़ लगातार ऊँचा ही जा रहा है। मुख्य कारण केवल संयोग नहीं, पैटर्न है। समग्र विश्लेषण से कुछ प्रमुख कारण उभरते हैं:
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ओवरस्पीडिंग और लापरवाही — कुल रिपोर्ट किए गए हादसों में से 12,213 दुर्घटनाएँ सिर्फ स्पीडिंग के कारण हुईं। ड्रंक ड्राइविंग ने अकेले 337 दुर्घटनाओं को जन्म दिया। यह संकेत देता है कि सड़कों पर अधूरी गति नियंत्रण नीतियाँ (speed regulation) और चालक अनुशासन का अभाव है।
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दोपहिया वाहनों की भूमिका — विशेष रूप से दोपहिया वाहनों में मृत्युदर अत्यधिक बढ़ी है। झारखंड में 2023 के आंकड़ों के अनुसार, 1,861 मौतें सिर्फ दोपहिया हादसों में हुईं, जो कुल मृतकों का बड़ा हिस्सा है। यह दर्शाता है कि हेलमेट, सुरक्षा उपकरणों और चालक प्रशिक्षण में कमी गंभीर समस्या है।
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सड़क अवसंरचना और ब्लैक स्पॉट्स — राज्य के कई राष्ट्रीय और राज्य मार्गों पर ब्लैक स्पॉट्स (जहाँ बार-बार दुर्घटनाएँ होती हैं) हैं, जिनके लिए सरकार ने पहचान की आवश्यकता स्वीकार की है, परन्तु पर्याप्त सुधार नहीं हुए हैं।
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आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं की कमी — बहुत से मामलों में दुर्घटना के समय प्राथमिक चिकित्सा और त्वरित एम्बुलेंस सेवाएँ नहीं मिल पातीं, जिससे “गोल्डन ऑवर” चूक जाता है — और बच सकती जानें भी चली जाती हैं।
कच्चा आंकड़ा ही नहीं — एक सामाजिक आपदा।
युद्ध, महामारी और प्राकृतिक आपदाओं की तुलना में सड़क हादसे एक मौन महामारी बन चुके हैं। 2023 में झारखंड में जितनी मौतें सड़क दुर्घटनाओं में हुईं (4,130), वह कई प्रमुख रोगों और आकस्मिक कारणों से होने वाली मौतों से कहीं अधिक है।
ज्यादातर मृतक 18–45 वर्ष के जीवन-और-कमाई के बीच के लोग हैं। इसका मतलब है कि हर मृत्यु एक परिवार को आर्थिक और सामाजिक रूप से तंगहाली की ओर धकेल रही है। अनगिनत बच्चे अनाथ हो रहे हैं तथा बुजुर्गों को परिवार चलाने की नई चुनौतियाँ मिल रही हैं — इसको केवल एक “सांख्यिकी समस्या” कहकर टाला नहीं जा सकता।
प्रशासन की प्रतिक्रिया: पर्याप्त या अपर्याप्त?
सरकार ने कुछ कदम उठाए हैं:
— अनजाने ब्लैक स्पॉट्स की पहचान की पहल
— 303 से अधिक ब्रेथ-अलाइज़र इकाइयाँ जिला स्तर पर मुहैया कराई गईं
— स्कूलों में सड़क सुरक्षा शिक्षा को शामिल करने की कोशिशें
— ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई
यह सब सकारात्मक है, पर बहुत ही सतही और प्रतिक्रिया-आधारित लगता है — प्री-इवेंट (दुर्घटना-पूर्व) नीतियों की जगह पोस्ट-इवेंट (दुर्घटना-बाद) पहलें ज़्यादा दिखाई देती हैं।
मौजूदा चुनौतियाँ — सिर्फ कानून ही नहीं पर्याप्त।
कुछ मुख्य अवरोध हैं:
— सड़क सुविधाओं में जिलों के बीच व्यापक अंतर
— ग्रामीण क्षेत्रों में अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएँ
— यातायात नियमों के प्रति सार्वजनिक जागरूकता की कमी
— अत्यधिक भारी वाहनों के मार्गों और सड़कों के बीच त्वरित समाधान की कमी
सुधार के ठोस उपाय: एक रोडमैप।
यह संकट केवल दंडात्मक नीतियों से हल नहीं होगा — इसके लिए समग्र, डेटा-आधारित, दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी।
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ब्लैक स्पॉट सुधार कार्यक्रम का त्वरित क्रियान्वयन — राज्य स्तर पर हाई-डेन्शिटी ब्लैक स्पॉट्स की पहचान कर तेज़ सुधार कार्य (साइन बोर्ड, रोशनी, फुटब्रिज, गति नियंत्रक) किया जाना चाहिए।
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टेक्नोलॉजी-आधारित निगरानी — स्पीड कैमरा, AI ट्रैफिक मॉनिटरिंग और सख़्त ई-चालान प्रणाली राज्य भर में लागू करने से नियम उल्लंघन में कमी आएगी।
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शिक्षा और चेतना — स्कूलों, कॉलेजों और समुदायों में नियमित सड़क सुरक्षा जागरूकता कार्यक्रम अनिवार्य किये जाने चाहिए, ताकि सड़क सुरक्षा हर नागरिक का निजी मुद्दा बने।
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आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं का विस्तार — राज्य के प्रत्येक ब्लैक स्पॉट के करीब त्वरित आपात चिकित्सा इकाइयाँ (Ambulance + Trauma Centers) होनी चाहिए, ताकि “गोल्डन ऑवर” का लाभ उठाया जा सके।
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भारी वाहन और खनन ट्रक नियंत्रण — खनन और भारी वाहन यातायात को समय-बद्ध प्रतिबंध और निगरानी के दायरे में लाना चाहिए, विशेष रूप से स्कूल और बाजार के आसपास।
राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता — सड़क दुर्घटना केवल ट्रैफिक विभाग का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, शहरी नियोजन और सामाजिक न्याय का मुद्दा है। जिस प्रकार स्वास्थ्य और शिक्षा को प्राथमिकता दी जाती है, उसी तरह सड़क सुरक्षा को भी राज्य की शीर्ष प्राथमिकता बनाना होगा।
झारखण्ड को यह तय करना होगा कि विकास का अर्थ केवल सड़क बनाना है या सुरक्षित सड़क बनाना भी है। यदि विकास की सड़क पर हर दिन निर्दोष नागरिकों की जान जाती रहे, तो वह विकास नहीं — विनाश है।
निष्कर्ष: सिर्फ डेटा नहीं — एक सामाजिक चेतना।
झारखण्ड की सड़कें विकास की गली हैं — पर अगर इसी गली में रोज़ाना दुर्घटना और मौतें होती रहें, तो यह विकास नहीं बल्कि विनाश है। आंकड़े बताती हैं कि दुर्घटनाओं की संख्या न बढ़कर घटनी चाहिए — नीतियाँ सिर्फ दंडात्मक में नहीं, बल्कि मानव-केन्द्रित और प्रबंधनीय योजना में होनी चाहिए।
राज्य की सड़क सुरक्षा केवल ट्रैफिक विभाग का काम नहीं है — यह सरकार, सामुदायिक संगठन, शिक्षा क्षेत्र और नागरिक समुदाय का संयुक्त विषय है। जैसे हर बच्चे को पढ़ना जरूरी है, वैसे ही हर नागरिक को सड़क सुरक्षा समझना ज़रूरी है। जब तक यह चेतना हमारे घरों, स्कूलों और सड़कों पर नहीं उतरेगी, सड़क पर मौतों का सिलसिला नहीं रुकेगा।
समय है कि हम सड़क दुर्घटनाओं को दुर्घटना न मानें, बल्कि इसे उन्मूलनीय सामाजिक समस्या के रूप में देखें और उसी गंभीरता से कार्य करें। यदि आज ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और भयावह रूप ले सकती है। अब समय है कि सड़क सुरक्षा को राजनीतिक नारे से निकालकर जमीनी प्राथमिकता बनाया जाए।
Susmita Rani is a journalist and content writer associated with Samridh Jharkhand. She regularly writes and reports on grassroots news from Jharkhand, covering social issues, agriculture, administration, public concerns, and daily horoscopes. Her writing focuses on factual accuracy, clarity, and public interest.
