अविभाजित भारत का दौर, खुला व्यापार व सुगम माहौल के चश्मदीद 100 वर्षीय चुन्नीलाल
उनके पिता और दादा यहां के किसानों को देते थे कपड़ा
कोडरमा: 1920-25 का दशक मुल्क अपनी आजादी के लिए भीतर ही भीतर आंदोलित तो था पर उस दौर में मुल्क विभाजन से कोसों दूर था, तब शायद जन मानस के जेहन में इसका कुछ भी भान तक न था, सरगोदा इलाके का एक गांव मोंग अब के पाकिस्तान का हिस्सा. मोंग गांव के रहने वाले ज्ञान सिंह और उनके पिता अतर सिंह दोनों कपडे का व्यापार करते थे. दोनो उस दौर में वहां से ट्रेन के जरिये कोलकाता जहां उनकी व्यापारिक गद्दी थी वहां आया जाया करते थे.
उस दौर में अविभाजित भारत के माहौल में हर जगह आने जाने का खुला वातावरण था. व्यापार के लिए लोग आते जाते रह्ते थे. 100 वर्षीय चुन्नीलाल की मानें तो उनके पिता ज्ञान सिंह और दादा अतर सिंह उस दौर में कोलकाता से कोडरमा कपड़े के काम केलिए आते जाते रहते थे. उनके अनुसार उस जमाने में उनके पिता और दादा यहां के किसानों को कपड़ा देते थे जब उनकी फसल कटती थी तो वे फिर आकर पैसा ले जाते थे, यह चलता था विश्वास के भरोसे.

अविभाजित भारत में व्यापार करना था सुगम
चुन्नीलाल की माने तो अविभाजित मुल्क के दौरान व्यापार करने का माहौल सुगम तो था मगर अंग्रेजी हुकूमत की कई बंदिशें भी थी. बचपन की यादों को लेकर कहते हैं उनके गांव मोंग से उत्तर में झेलम नदी और पश्चिम में बड़ी व उपयोगी नहर थी. विभाजन के पहले तक उनकी माता जी वन्ती देवी और दादी हरदेयी देवी गांव में ही रह रही थीं. वह विभाजन के 6 दिन पूर्व दूसरे परिजन के साथ 9 अगस्त 1947 को यहां सकुशल आ गये थे और सब कुछ वहीं छूट गया.
उनके मुताबिक मुल्क की आजादी के बाद 1952 में हुए चुनाव में उन्होने पहली बार मत डाले थे, यह सिलसिला अनवरत जारी है. चुन्नीलाल जीवन के इस पड़ाव पर अतीत को याद्कर काफी रोमांचित हो जाते हैं. कहते हैं जीवन भर हमारा परिवार मैं स्वयं सम्मान और दूसरों के प्रति सहयोग के भाव से काम किया, जिंदगी जिये पर अब ये चीजें समाज में घटती जा रही हैं. शायद इससे नेशन भी कहीं न कही कमजोर हो रहा है इसे मजबूत किया जाना चाहिए. उनकी मानें तो घट रहे सामाजिक सरोकार को भाइचारगी व मोह्ब्ब्त से पाट कर ही समाज में इंसानियत की तस्वीर बदल सकती है.
