सैटेलाइट सिस्टम में गड़बड़ी! तीनों सेना के ऑपरेशन पर खतरा, विदेशी सिस्टम कितना सुरक्षित?

विदेशी GPS पर निर्भरता क्यों खतरनाक है?

सैटेलाइट सिस्टम में गड़बड़ी! तीनों सेना के ऑपरेशन पर खतरा, विदेशी सिस्टम कितना सुरक्षित?
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नई दिल्ली: भारत का स्वदेशी रीजनल नेविगेशन सिस्टम “नैवआईसी” (NavIC) वर्तमान में गंभीर तकनीकी संकट के दौर से गुजर रहा है, जिससे भारतीय सशस्त्र बलों की सामरिक और रक्षा जरूरतों के लिए स्वदेशी नेविगेशन पर निर्भरता सीमित हो गई है। विशेषज्ञ बता रहे हैं कि परमाणु घड़ियों में आई खराबी की वजह से नैवआईसी सिस्टम पूरी तरह सुरक्षित और विश्वसनीय नहीं माना जा रहा, जिसके चलते सेनाओं को अब विदेशी नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम पर ज्यादा भरोसा करना पड़ रहा है।NavIC explained: How India's GPS alternative works and why it matters in a  crisis | - The Times of India

नैवआईसी में क्या दिक्कत है?

नैवआईसी स्टेटेलाइट्स के भीतर लगी परमाणु घड़ियों (atomic clocks) में खराबी आने से सिस्टम की टाइमिंग सटीकता प्रभावित हुई है, जो नेविगेशन और पोजिशनिंग के लिए बेहद जरूरी है। एक्सपर्ट्स के अनुसार, नैवआईसी के प्रभावी रूप से काम करने के लिए कम से कम चार सैटेलाइट्स पर परमाणु घड़ियां पूरी तरह सही सलामत होनी चाहिए, लेकिन अब यह न्यूनतम जरूरत भी पूरी नहीं हो पा रही। परिणामस्वरूप नागरिक उपकरणों से लेकर रक्षा उपकरणों तक के लिए भी नैवआईसी को “रिलायबल” सर्विस मानना मुश्किल हो गया है।SAMEER

सेनाओं के लिए खास चुनौतियां

नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम लॉजिस्टिक, मैपिंग, युद्ध रणनीति और ऑपरेशनल प्लानिंग में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। जब नैवआईसी जैसा स्वदेशी नेटवर्क काम नहीं कर पाता, तो सेनाओं को अमेरिका के GPS, रूस के GLONASS और चीन आधारित बेडऊ जैसी विदेशी नेविगेशन सर्विसेज पर भरोसा करना पड़ता है, जो सुरक्षा दृष्टि से जोखिम भरा माना जाता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि संघर्ष के दौरान दूसरा देश अचानक सिग्नल बंद कर सकता है या गलत जानकारी भेजकर भारतीय यूनिट्स को गलत स्थान पर खींच भी सकता है, जो रणनीतिक रूप से बेहद खतरनाक हो सकता है।3D Military Command Center - TurboSquid 2267056

स्वदेशी आत्मनिर्भरता का लक्ष्य और वर्तमान स्थिति

नैवआईसी परियोजना 2013 से 2018 के बीच औपचारिक रूप से पूरी हुई थी, इसका मुख्य उद्देश्य था कि भारत सुरक्षा क्षेत्र में बिना विदेशी निर्भरता के स्वायत्त नेविगेशन क्षमता हासिल कर सके। कारगिल युद्ध (1999) के दौरान अमेरिका द्वारा GPS डेटा बंद करने के अनुभव के बाद भारत ने अपना स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम विकसित करने का फैसला लिया था। हालांकि, पहली पीढ़ी वाले भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशनल सैटेलाइट सिस्टम (IRNSS / नैवआईसी) में अब तक कई सैटेलाइट्स से परमाणु घड़ियों की खराबी की रिपोर्ट आ चुकी है, जिससे सिस्टम की सैन्य और सामरिक उपयोगिता पर सवाल खड़े हो गए हैं।NavIC GPS: Everything You Need to Know About India's Navigation System

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विदेशी सिस्टम पर निर्भरता के सुरक्षा जोखिम

विशेषज्ञ कहते हैं कि जब देश अपने सुरक्षा ऑपरेशन के लिए दूसरे राष्ट्र के सैटेलाइट स्टेशन और सिग्नल पर निर्भर हो, तो वह उस देश की नीतिगत और रणनीतिक चाह अनचाह के आधार पर डेटा पर नियंत्रण खो देता है। युद्ध के समय सिग्नल में गड़बड़ी, गलत लोकेशन या अचानक सर्विस बंद होने की संभावना रहती है, जिससे मिसाइल, ड्रोन, मोबाइल इकाइयां और कमांड सिस्टम तक भ्रम की स्थिति में आ सकते हैं। ऐसे में नैवआईसी की कमजोरी सिर्फ तकनीकी दिक्कत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की रणनीति के लिए भी एक गंभीर चुनौती बन गई है।

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आगे की राह और संभावित उपाय

स्थिति को संभालने के लिए अधिकारी और वैज्ञानिक नई पीढ़ी के नैवआईसी सैटेलाइट्स की तेज रफ्तार से लॉन्चिंग, बेहतर तकनीक पर आधारित परमाणु घड़ियों का उपयोग और बैकअप नेविगेशन नेटवर्क (जैसे ग्राउंड बेस्ड लोकेशन सिस्टम या मल्टी कॉन्स्टेलेशन इंटीग्रेशन) की तैयारी पर जोर दे रहे हैं। इसके साथ साथ सुरक्षा डोमेन में मल्टीपल नेविगेशन सिस्टम (जैसे NavIC + GPS + अन्य GNSS) के मिश्रित उपयोग पर रिसर्च और टेस्टिंग तेज की जा रही है, ताकि किसी एक स्रोत के खंडित होने पर भी मूल ऑपरेशन बाधित न हो। कई विश्लेषक मानते हैं कि अगर भारत नैवआईसी को दोबारा विश्वसनीय और सुरक्षित बनाने के लिए तेजी से निर्णय नहीं लेता, तो दीर्घकाल में रक्षा क्षेत्र में विदेशी नेविगेशन पर निर्भरता बढ़ने का खतरा बना रहेगा।

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Edited By: Samridh Desk
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