जब दुश्मन सीमा पर था, और मतभेद अंदर: ‘ऑपरेशन विजय’ की एक अनसुनी कहानी
थलसेना बनाम वायुसेना: रणनीति पर असहमति ने कितना बिगाड़ा समीकरण?
कारगिल युद्ध की 26वीं वर्षगांठ पर उठता है बड़ा सवाल – क्या भारतीय सेना के भीतर रणनीति पर असहमति थी? जानिए वायुसेना की भूमिका को लेकर जनरल्स में क्यों हुआ था मतभेद।
नई दिल्ली: कारगिल विजय दिवस के 26 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन इस युद्ध से जुड़ी कुछ अनकही सच्चाइयाँ आज भी सैन्य इतिहासकारों और रणनीतिक विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि भारत की थलसेना और वायुसेना के शीर्ष जनरल इस बात पर एकमत नहीं थे कि वायुसेना को युद्ध में कब और कैसे शामिल किया जाए।
कारगिल की लड़ाई में एक समय ऐसा भी आया, जब दो भारतीय जनरल आमने-सामने आ गए। मुद्दा था कि कारगिल में एयरफोर्स को उतारा जाए या नहीं। दूसरी तरफ मुशर्रफ की फौज थी, जो पाकिस्तान की सरकार के हाथ से निकल चुकी थी। कारगिल की लड़ाई के दौरान भारतीय सेना के प्रमुख रहे वेद प्रकाश मलिक चाहते थे कि एयरफोर्स को उतारा जाए। दूसरी तरफ वायुसेना अध्यक्ष अनिल यशवंत टिपनिस, इस पहल को कोई खास तव्वजो नहीं दे रहे थे। ये अलग बात रही कि तत्कालीन वाइस चीफ ऑफ एयरस्टाफ चंद्रशेखर ने कारगिल में वायुसेना भेजने की पैरवी की। जनरल वीपी मलिक ने बंद कमरे की बैठक में साफ कह दिया कि 'कारगिल व लद्दाख में लड़ रही सेना के लिए वायुसेना की मदद पहुंचना जरूरी है। मैं इसके लिए कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) के सामने आपका (अनिल यशवंत टिपनिस) का विरोध करूंगा।' इसके बाद कभी सीसीएस तो कभी विदेश मंत्री जसवंत सिंह वायु सेना के इस्तेमाल के खिलाफ खड़े हो गए। हालांकि बाद में वायुसेना को कारगिल में उतारने को लेकर सहमति बन गई।
अंदर की बात क्या थी?
बंद कमरे में क्या बोले वाइस चीफ ऑफ एयरस्टाफ ...

क्या था राजनीतिक दबाव?
उस समय की सरकार बेहद सावधानी से कदम उठा रही थी क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि और सीमित युद्ध की रणनीति को लेकर काफी चिंता थी। यही कारण रहा कि एयरफोर्स को सीमित भूमिका में देर से उतारा गया।
इतिहासकारों का मत:
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर भारतीय सेनाओं के बीच रणनीतिक समन्वय अधिक बेहतर होता, तो शहीदों की संख्या और संघर्ष का समय दोनों कम हो सकते थे।
(नोट: समृद्ध झारखंड इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं करता है।)
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