“बेटी की पुकार – एक भावपूर्ण कविता”
शिक्षा के लिए पिता से बेटी की संवेदनशील गुहार
यह कविता एक बेटी की भावनाओं को व्यक्त करती है, जो पढ़-लिखकर सम्मानजनक जीवन जीना चाहती है। मजदूरी और मजबूरी के जीवन से दूर, वह शिक्षा के माध्यम से आगे बढ़ने का सपना देखती है।
पापा, मुझको पढ़ लेने दो,
थोड़ा मुझमें भी हो गरूर
चाहे चपरासी बन जाऊं
मुझे नहीं बनना मजदूर

घूर रहें हैं क्रूर नज़र से
लज्जा ढकते मैं थक चुकी
निर्लज्ज, देखता रहता घूर-घूर
चपरासी चाहे बन जाऊं
मुझे नहीं बनना मजदूर
लोगों की अश्लील बातें
आंशुओं में कटती है रातें
ठोकर खाते-खाते हमारा
जीवन हुआ मजबूर
चपरासी चाहे बन जाऊं
मुझे नहीं बनना मजदूर
पढ़ाई की मुझमें सुरूर चढ़ी है
सरकार भी सुविधा दे रही है
आपकी कृपा सर पर बनी रहे
पापा, चलो न थोड़ी दूर
चपरासी चाहे बन जाऊं
मुझे नहीं बनना मजदूर
पापा, मुझको पढ़ लेने दो
थोड़ा मुझमें भी हो गरूर
चपरासी चाहे बन जाऊं
मुझे नहीं बनना मजदूर
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.
