बापू से सवाल – एक गहन सोच
महंगाई और बेरोजगारी पर तीखी सामाजिक कविता
यह कविता आधुनिक भारत की सामाजिक और आर्थिक वास्तविकताओं को उजागर करती है। किसान, गरीब, युवा, महंगाई, बेरोजगारी और राजनीतिक विभाजन के माध्यम से यह रचना बापू से सवाल करती है कि क्या यही विकास का सही अर्थ है।
बापू… हम विश्व गुरु बनने जा रहे हैं,
दुनिया में सम्मान पा रहे हैं।
बदलाव भी ज़रूरी है,
बुलेट ट्रेन की लाइनें बिछा रहे हैं,
पर आज…
देश के किसान बेमौत मारे जा रहे हैं।

कोयला, लकड़ी फिर से याद आ रही है।
परिवर्तन भी ज़रूरी है,
हम नए-नए ग्रहों को छूने जा रहे हैं,
पर आज…
देश में गरीब बे-इलाज मारे जा रहे हैं।
बापू… शासन से विश्वास टूट रहा है,
बेरोज़गार अपने कर्म को कोस रहा है।
नए आयाम भी ज़रूरी हैं,
हम हज़ारों कोस रास्ते बढ़ा रहे हैं,
पर आज…
देश में युवा धिक्कारे जा रहे हैं।
बापू… हिंदुस्तान पार्टियों में बंट रहा है,
देशहित अब निजहित में सिमट रहा है।
गहन सोच भी ज़रूरी है,
हम देश को कहाँ से कहाँ ले जा रहे हैं,
पर आज…
भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।
बापू… आज देश में ढेरों काम हो रहे हैं,
विश्व में उद्घोष के साथ सम्मान हो रहे हैं।
सम्मान पर इठलाना भी ज़रूरी है,
हम सबको इस पर दिल से गुमान है,
पर आज…
ठहाकों वाली गलियाँ और बस्तियाँ सुनसान हैं।
बापू… आज लोगों के मुख पर हँसी नहीं है,
खिलखिला कर हँस पड़े वैसी खुशी नहीं है।
रुपए-पैसे भी ज़रूरी हैं,
हम थोड़ा-थोड़ा और लादे जा रहे हैं,
पर आज…
जीवन-यापन के लिए लोग भागे जा रहे हैं।
Susmita Rani is a journalist and content writer associated with Samridh Jharkhand. She regularly writes and reports on grassroots news from Jharkhand, covering social issues, agriculture, administration, public concerns, and daily horoscopes. Her writing focuses on factual accuracy, clarity, and public interest.
