मालिक की मर्जी: जीवन की उलझनों पर आधारित भावपूर्ण कविता
जीवन की दौड़ में ठहरकर सोचने को मजबूर करती पंक्तियाँ
By: Mohit Sinha
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यह कविता इंसान की मानसिक स्थिति, जीवन की उलझनों और आत्मसंघर्ष को व्यक्त करती है। इसमें दिखाया गया है कि मनुष्य खुद को सबका मालिक समझता है, लेकिन परिस्थितियाँ उसे ईश्वरीय इच्छा के आगे झुका देती हैं।
कभी-कभी थक जाता हूँ
चलते-चलते रुक जाता हूँ
जब कारण समझ नहीं पाता
तब अंदर से आती है आवाज़-
मालिक की मर्जी...
समझता रहा उम्र भर यही
मैं अपनी मर्जी का मालिक हूँ
है मेरे आस-पास जो दुनिया
उसका मैं ही तो खालिक हूँ
फिर क्यों कभी-कभी मैं उसको
लगाता हूँ अर्जी...
मालिक की मर्जी!
आता है मुझे गुस्सा बहुत और
यह जग लुटेरा लगता है,
खरीद लूँगा मैं सब-कुछ बस
पता तो चले कहाँ बिकता है।
अपने अलावा किसी का किया
मुझे क्यों लगता है फर्जी...
मालिक की मर्जी !
काश ! कोई मेरे फटे हुए
संस्कारों को सी देता !
बनाकर एक अनूठा वस्त्र,
मेरे दुर्गुणों को पी लेता !
मिलता नहीं क्यों मुझे
कोई ऐसा दर्जी ?
मालिक की मर्जी...
मौलिक कृति-
राकेश रमण 'रार'
राकेश रमण 'रार'
Edited By: Mohit Sinha
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.
