Climate कहानी: जलवायु नीति पर बहस में भारतीय कंपनियाँ खामोश

भारत में 2070 तक नेट ज़ीरो उत्सर्जन लक्ष्य 

Climate कहानी: जलवायु नीति पर बहस में भारतीय कंपनियाँ खामोश
फाइल फोटो (सोर्स-जनसता)

भारतीय व्यापार जगत सरकार की जलवायु नीतियों में किस प्रकार से भाग ले रही हैं, इस बारे में इस नये इस विश्लेषण से पता चलता है की भारतीय कंपनियां और उद्योग संगठन वैश्विक स्तर पर अपने समकक्षों की तुलना में विज्ञान-आधारित जलवायु नीतियों के प्रति अधिक समर्थन दिखा रहे हैं.

आजकल हर कोई Net Zero की बातें करता है. कॉरपोरेट जगत से भी बड़े-बड़े climate commitments आते हैं—websites पर sustainability pledges हैं, events में climate change पर panels हैं… लेकिन जब बात असल नीति निर्माण की आती है—जहाँ सच में बदलाव की बुनियाद रखी जाती है—तो ज़्यादातर कंपनियाँ खामोश नज़र आती हैं.

भारतीय व्यापार जगत सरकार की जलवायु नीतियों में किस प्रकार से भाग ले रही हैं, इस बारे में इस नये इस विश्लेषण से पता चलता है की भारतीय कंपनियां और उद्योग संगठन वैश्विक स्तर पर अपने समकक्षों की तुलना में विज्ञान-आधारित जलवायु नीतियों के प्रति अधिक समर्थन दिखा रहे हैं. हालांकि, यह समर्थन ज़्यादातर केवल सतही है. यह समर्थन नीति निर्माण की प्रक्रिया में एक ज़मीनी हक़ीक़त बनकर भागीदार बनने में अभी सक्षम नहीं हुआ है जिससे एनर्जी सेक्टर में ट्रांजेक्शन की दिशा में अवरोध स्पष्ट दिखाई दे रहा है.

इन्फ्लुएंस मैप का कॉरपोरेट इंडिया का यह अपनी तरह का पहला विश्लेषण है, जो दर्शाता है कि भारतीय उद्योग जगत में महत्वाकांक्षी जलवायु नीति का कोई संगठित विरोध नहीं है, जबकि ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे देशों में फासिल फ़्यूल आधारित उद्योगों का वर्चस्व स्पष्ट विरोध का कारण बनता है. यह स्थिति भारतीय कंपनियों के लिए सरकार के साथ मिलकर जलवायु कार्रवाई में वैश्विक नेतृत्व निभाने का बेहतरीन अवसर दे रही हैं.

इस शोध के लिए इन्फ्लुएंस मैप ने जलवायु से जुड़े क्षेत्रों की भारत की 20 सबसे बड़ी कंपनियों की जलवायु नीति में भागीदारी का आँकलन किया. आँकलन में सामने आया कि केवल एक कंपनी— Re New(रिन्यू)— ऐसी है जो ग्लोबल वार्मिंग को 1.5°C के अंदर सीमित रखने वाले विज्ञान-आधारित रास्तों के अनुरूप नीति समर्थन कर रही है, जबकि बाक़ी 18 कंपनियां बस आंशिक रूप से इस दिशा में काम कर रही हैं.

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इन्फ्लुएंस मैप के रणनीतिक भागीदारी के मानदंड के हिसाब से, इस आँकलन में शामिल 20 कंपनियों में से 17 कंपनियों की नीति भागीदारी का स्तर 25% से कम रहा है. इसका साफ़ मतलब है कि जलवायु को लेकर कंपनियों द्वारा की जाने वाली सकारात्मक बयानबाजी है. वास्तव में सक्रिय नीति-समर्थन में नहीं बदल रही हैं. यह एक ठोस सक्रिय नीति हस्तक्षेप के अमली जामे में, जो बदलाव ला सकें नहीं तब्दील हो रही है. उदाहरण के लिए, 20 में से 9 कंपनियों ने भारत के 2030 तक 500 गीगावाट रिन्युब्ल एनर्जी लक्ष्य का समर्थन किया. लेकिन सिर्फ़ 5 कंपनियां भारत की कार्बन क्रेडिट और ट्रेडिंग प्रणाली (CCTS) में सक्रिय थीं.

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इस विश्लेषण में भारत के आठ सबसे प्रभावशाली उद्योग संगठनों भी हैं. जिनमें एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (ASSOCHAM), भारतीय उद्योग परिसंघ (CII), और भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (FICCI) शामिल हैं. इन आठों में से कोई भी संगठन पेरिस समझौते के ग्लोबल वार्मिंग के 1.5°C सीमा लक्ष्य को हासिल करने के लिए आवश्यक विज्ञान-आधारित नीति मार्गों के साथ पूरी तरह से मेल नहीं खाता. हालांकि, आठ में से सात संगठनों ने आंशिक रूप से इससे मेल खाती जलवायु नीति भागीदारी का प्रदर्शन किया. इस समूह में CII अग्रणी के रूप में उभरकर सामने आता है, जो अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान जैसे प्रमुख अर्थतंत्रों के विपरीत है, जहां बहु-क्षेत्रीय उद्योग संगठन आमतौर पर जलवायु नीति में भागीदारी के मामले में पीछे रह जाते हैं.

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SIAM (सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स) को इस विश्लेषण में सबसे कम स्कोर मिला. हालांकि इसने हालिया इलेक्ट्रिक वाहन (EV) नीतियों का समर्थन किया है, लेकिन इसका पिछला रिकॉर्ड पेट्रोल/डीजल मानकों का विरोध और आंतरिक दहन इंजन (ICE) वाहनों के पक्ष में रहा है. यह स्थिति उसके कुछ सदस्य जैसे महिंद्रा एंड महिंद्रा के जलवायु नीति में कहीं अधिक सकारात्मक योगदान के बिल्कुल विपरीत है. ऐसे विरोधाभास वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा हैं, जहां उद्योग संगठन अपने सदस्यों के ‘lowest common denominator’ रुख को ही अपनाते हैं — यह निवेशकों के लिए चिंता का विषय है.

भारत इस समय अपने 2070 तक नेट ज़ीरो उत्सर्जन लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण मोड़ पर है, और सरकार लगातार नई जलवायु नीतियां लागू कर रही है, जिनमें राष्ट्रीय कार्बन बाजार का गठन शामिल है. कंपनियों और उद्योग संगठनों की नीति की वकालत इन पहलों की सफलता में अहम भूमिका निभाएगी. भारत में व्यवसायों के बीच बदलाव या ट्रांजीशन का विरोध कम होना, Re New जैसी कंपनियों के लिए वैश्विक स्तर पर नेतृत्व का अवसर प्रस्तुत करता है.

बिज़नेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग (BRSR) से जुड़े मौजूदा दिशानिर्देश कंपनियों को जलवायु नीति भागीदारी की गतिविधियों को अधिक पारदर्शिता से उजागर करने का एक बेहतरीन शुरुआती कदम मुहैया कराती हैं. हालांकि, इन्फ्लुएंस मैप के नवीनतम विश्लेषण में पाया गया कि केवल छह कंपनियों ने BRSR में उन वैकल्पिक सवालों का जवाब दिया जो प्रत्यक्ष जलवायु नीति भागीदारी गतिविधियों के खुलासे के लिए आमंत्रित करते हैं. जबकि उन्होंने अन्य अनिवार्य प्रश्नों—जैसे उद्योग संगठनों की सदस्यता जैसे सवालों का जवाब ज़रूर दिया. Influence Map भारत में अपनी नई India Platform के माध्यम से नीति-निर्धारण में कॉरपोरेट भागीदारी की स्थिति को ट्रैक करता रहेगा.

विवेक पारिख, इंडिया प्रोग्राम लीड, इन्फ्लुएंस मैप ने कहा: “भारत में कॉरपोरेट क्षेत्र का इन्फ्लुएंस मैप द्वारा किया गया पहला मूल्यांकन दर्शाता है कि जलवायु नीति का कोई स्थापित या संगठित विरोध मौजूद नहीं है. ऐसे में, आगे की सोच रखने वाली कंपनियों के पास एनर्जी ट्रांज़िशन को आगे बढ़ाने और विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक में ‘फर्स्ट मूवर’ होने का लाभ हासिल करने का एक बड़ा अवसर है.

यह इस ओर भी ध्यान दिलाता है कि कंपनियां अभी क्या कदम उठा सकती हैं ताकि वे इस रास्ते पर आगे बढ़ सकें—जैसे यह समझना कि सरकारों के सामने उनके हित कैसे प्रस्तुत किए जा रहे हैं—क्योंकि शोध यह दर्शाता है कि यह प्रस्तुतिकरण भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र की शीर्ष स्तर की जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए किए गए वायदों से मेल नहीं खा रहा है. इसके साथ ही, वे BRSR जैसे तंत्रों का पूरा इस्तेमाल कर सकते हैं. जो जलवायु नीति में भागीदारी से संबंधित खुलासों में पारदर्शिता बढ़ाने का एक अहम माध्यम है.

 

Edited By: Sujit Sinha
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