Climate कहानी: भारत में ग्लोबल वार्मिंग अब दूर की चिंता नहीं, बल्कि ज़मीनी हक़ीक़त 

2024 बना भारत का सबसे गर्म साल, 450 से ज़्यादा मौतें

Climate कहानी: भारत में ग्लोबल वार्मिंग अब दूर की चिंता नहीं, बल्कि ज़मीनी हक़ीक़त 
(सोर्स- Climate कहानी)

भारत में किए गए एक राष्ट्रीय सर्वे में सामने आया है कि 89% लोगों ने ग्लोबल वार्मिंग के असर को खुद महसूस किया. हीटवेव, बाढ़ और तूफ़ान ने जीवन को प्रभावित किया है. लोग अब सरकार और समाज से ठोस कार्रवाई की उम्मीद कर रहे हैं.

भारत के 89% लोग कह रहे हैं कि उन्होंने खुद ग्लोबल वार्मिंग का असर महसूस किया है. कभी तपते हीटवेव, कभी बेहिसाब बारिश, कभी तूफ़ान, मौसम अब पहले जैसा नहीं रहा. और यही वजह है कि 78% लोग चाहते हैं कि सरकार इस संकट से निपटने के लिए और ज़्यादा काम करे.

ये आंकड़े आए हैं येल प्रोग्राम ऑन क्लाइमेट चेंज कम्युनिकेशन और सीवोटर इंटरनेशनल के सर्वे से, जो मार्च-अप्रैल 2025 में पूरे देश में किया गया. इसमें पहली बार आधे से ज़्यादा लोग (53%) ने माना कि उन्हें ग्लोबल वार्मिंग के बारे में “कुछ न कुछ” जानकारी है, लेकिन अभी भी 27% लोग ऐसे हैं जिन्होंने इसके बारे में कभी सुना ही नहीं.

जब लोगों को ग्लोबल वार्मिंग का छोटा सा मतलब और उसका मौसम पर असर समझाया गया, तो 96% ने कहा, हाँ, ये हो रही है. 90% लोग इसको लेकर चिंतित हैं, जिनमें से 58% “बहुत ज़्यादा” चिंतित हैं.

2024 का साल भारत के लिए सबसे गर्म साल रहा—औसतन तापमान 1°C ऊपर, 450 से ज़्यादा हीटवेव मौतें, यहां तक कि चुनाव ड्यूटी पर तैनात अफसर भी इसकी चपेट में आए.

सर्वे में ये भी सामने आया कि लोग वजहें तो कुछ समझते हैं, लेकिन पूरी तस्वीर साफ़ नहीं है. 82% को पता है कि पेट्रोल-डीज़ल वाली गाड़ियां ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाती हैं, 61% को कोयला और गैस से चलने वाले बिजलीघर के बारे में जानकारी है. लेकिन सिर्फ 26% को पता है कि मांस उत्पादन भी इसका कारण है, जबकि 84% गलतफहमी में हैं कि प्लास्टिक प्रदूषण भी इसका बड़ा कारण है.

सरकारी कार्रवाई को लेकर तस्वीर साफ़ है

78% लोग चाहते हैं सरकार और कदम उठाए
86% नेट ज़ीरो 2070 लक्ष्य के पक्ष में हैं
84% नए कोयला बिजलीघर पर पाबंदी और पुराने बंद करने के हक में हैं
94% चाहते हैं कि सौर और पवन ऊर्जा में नए रोजगार के लिए राष्ट्रीय ट्रेनिंग प्रोग्राम चले
93% चाहते हैं कि पूरे देश में ग्लोबल वार्मिंग पर शिक्षा दी जाए
89% महिलाओं और आदिवासी समुदायों को पर्यावरण संरक्षण में सहयोग देने के पक्ष में हैं

लेकिन इस तस्वीर में एक साया भी है, 35% लोगों ने पिछले साल कभी-कभी साफ़ पानी की कमी झेली, आधे से ज़्यादा लोग कहते हैं कि उनकी आमदनी ज़रूरतें पूरी नहीं करती, और 30% ने या तो मौसम की मार से घर छोड़ा या छोड़ने की सोच रहे हैं.

सीवोटर इंटरनेशनल के यशवंत देशमुख कहते हैं, “लोग न सिर्फ सीखना चाहते हैं, बल्कि खुद भी जलवायु संकट से निपटने में हाथ बंटाने को तैयार हैं.”

ये सर्वे साफ़ करता है, भारत में ग्लोबल वार्मिंग अब किसी दूर की चिंता नहीं, बल्कि हर रोज़ की हक़ीक़त है. फर्क सिर्फ इतना है कि क्या हम इसे समझकर कदम उठाते हैं, या इंतज़ार करते हैं कि मौसम हमें आखिरी सबक खुद सिखा दे.

Edited By: Mohit Sinha
Mohit Sinha Picture

Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.

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