Opinion : डिजिटल लत के साये में बचपन, टूटती जिंदगियां और भारत की अधूरी सोशल मीडिया सुरक्षा नीति

गेमिंग और सोशल मीडिया एल्गोरिदम कैसे दिमाग को नियंत्रित करते हैं

Opinion : डिजिटल लत के साये में बचपन, टूटती जिंदगियां और भारत की अधूरी सोशल मीडिया सुरक्षा नीति

भारत में तेजी से बढ़ती मोबाइल और इंटरनेट पहुंच बच्चों की मानसिक दुनिया को बदल रही है। ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया एल्गोरिदम उन्हें लत के जाल में फंसा रहे हैं, जहां खेल और असली जिंदगी की सीमा मिटती जा रही है। हाल की घटनाएं इस डिजिटल खतरे की गंभीरता को उजागर करती हैं।

भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां बच्चों की दुनिया तेजी से बदल रही है। खिलौनों, मैदानों और दोस्तों की जगह मोबाइल स्क्रीन ने ले ली है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि धीरे-धीरे हमारी आंखों के सामने पनपा। गाजियाबाद की तीन नाबालिग बहनों और भोपाल के एक 14 साल के बच्चे की मौत ने इस सच्चाई को बेरहमी से उजागर कर दिया है कि डिजिटल दुनिया अब सिर्फ मनोरंजन नहीं रही, बल्कि कई मासूम जिंदगियों के लिए मानसिक जाल बन चुकी है।

ये घटनाएं कोई इत्तेफाक नहीं हैं, बल्कि उस सिस्टम का नतीजा हैं जहां बच्चों की सुरक्षा से ज्यादा अहमियत डिजिटल मुनाफे को दी जा रही है। भारत में इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच ने पिछले एक दशक में क्रांति ला दी। सरकारी और निजी रिपोर्टों के मुताबिक आज देश में 80 करोड़ से ज्यादा इंटरनेट यूजर हैं और इनमें करीब एक तिहाई बच्चे और किशोर हैं। एक औसत भारतीय बच्चा रोजाना 3 से 6 घंटे स्क्रीन पर बिता रहा है। कोरोना महामारी के दौरान यह समय और बढ़ा।

ऑनलाइन पढ़ाई ने मोबाइल को बच्चों की जिंदगी का अनिवार्य हिस्सा बना दिया। लेकिन पढ़ाई खत्म होने के बाद वही मोबाइल गेमिंग, सोशल मीडिया और ऑनलाइन चैलेंज का प्रवेश द्वार बन गया. धीरे-धीरे बच्चों के लिए असली दुनिया उबाऊ और स्क्रीन के भीतर की दुनिया ज्यादा आकर्षक लगने लगी।

ऑनलाइन गेमिंग का मनोविज्ञान बेहद जटिल है। कई गेम्स और टास्क-बेस्ड ऑनलाइन ट्रेंड इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि यूजर को लगातार अगला स्तर पूरा करने की बेचैनी बनी रहे । हर टास्क पूरा होने पर दिमाग में डोपामिन रिलीज होता है, जो खुशी और संतुष्टि का एहसास देता है।

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यही प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है और लत बन जाती है। बच्चों का दिमाग, जो अभी विकास की अवस्था में होता है, इस प्रभाव को समझ नहीं पाता. वे यह फर्क नहीं कर पाते कि गेम का दबाव और असली जिंदगी की अहमियत क्या है। गाजियाबाद की तीनों बहनों के मामले में भी शुरुआती जांच यही संकेत देती है कि वे एक टास्क-बेस्ड ऑनलाइन गेम से भावनात्मक रूप से जुड़ चुकी थीं, जहां गेम पूरा करना ही उनका लक्ष्य बन गया था।

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समस्या सिर्फ गेमिंग तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया एल्गोरिदम भी इसी सिद्धांत पर काम करते हैं. रील्स, शॉर्ट वीडियो और लाइक-शेयर का सिस्टम बच्चों को लंबे समय तक स्क्रीन से बांधे रखता है। कंपनियों का मुनाफा यूजर के समय पर निर्भर करता है। जितना ज्यादा समय बच्चा स्क्रीन पर रहेगा, उतना ज्यादा डेटा, उतना ज्यादा विज्ञापन और उतनी ज्यादा कमाई। लेकिन इस दौड़ में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की कीमत कोई नहीं गिनता। भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए बच्चों की सुरक्षा को लेकर नियम तो हैं, लेकिन वे या तो अधूरे हैं या सख्ती से लागू नहीं होते।

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Edited By: Susmita Rani

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