कम हो रही है पीएम मोदी की लोकप्रियता: डॉ. अतुल मलिकराम
क्या मोदी मैजिक कम होता जा रहा है?
राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. अतुल मलिकराम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घटती लोकप्रियता पर एक विश्लेषण प्रस्तुत किया है. उनका मानना है कि कभी सोशल मीडिया के दम पर राष्ट्रीय चेहरा बने मोदी की सभाओं में अब खाली कुर्सियाँ दिखती हैं और उनके भाषणों के प्रति लोगों का आकर्षण कम हुआ है. डॉ. मलिकराम ने पीएम मोदी की लोकप्रियता में आई इस कथित गिरावट के पीछे कई कारण बताए हैं.
हमने पिछले डेढ़ दशक के दौरान भारतीय राजनीति को कई परिदृश्यों में बदलते देखा है. कैसे कुछ बेहतर सोशल मीडिया कैंपेन्स के दम पर एक राज्य तक सीमित राजनेता राष्ट्रीय चेहरा बन गया और सत्ता के केंद्र में स्थापित हो गया. जाहिर है बात पीएम मोदी की हो रही है जिन्होंने लगातार तीन बार न केवल देश का प्रधानमंत्री बनने का गौरव प्राप्त किया, बल्कि विश्व की सबसे बड़ी आबादी को अपनी वाक्पटुता से एक काल्पनिक 'नए भारत' का सपना दिखाने में भी नई मिसाल कायम की. हालांकि अब जब समय के साथ स्वप्न लोक में खोई जनता धीरे-धीरे जागना शुरू हो रही है तो पीएम मोदी का भी हकीकत से सामना करना मुश्किल होता जा रहा है. इसे उनकी सभाओं में लोगों के इंतज़ार में मुंह निहारती खाली कुर्सियों, 'मन की बात' से पुनः निर्जीव होने की कगार पर पहुंच रहे रेडियो स्टेशंस और टीवी चैनल्स पर उनके भाषणों के लिए चैनल्स के कर्मचारियों द्वारा ही बढ़ाई जा रही टीआरपी से भली-भाँती समझा जा सकता है. यहाँ तक कि वो सोशल मीडिया भी अब कोई तिलिस्म करने में खुद को असमर्थ महसूस कर रहा है जो नरेंद्र मोदी के मुखारविंद से निकलने वाले किसी शब्द मात्र को 'राम बाण' बनाने की शक्ति रखता था.
इस बात से शायद कई लोग अपनी सहमति रखें कि कभी मंच पर पीएम मोदी आते तो कुर्सियों पर बैठने के लिए भी जगह कम पड़ जाती थी, और टीवी पर भाषण आने भर से रिमोट मानो खुद-ब-खुद 'स्टे' मोड में चला जाता था. लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि सभाओं में खाली कुर्सियाँ वीआईपी गेस्ट की तरह सामने की पंक्ति में विराजमान दिखती हैं, और मन की बात का नाम सुनते ही रेडियो-टीवी के वॉल्यूम, अपने आप मंद होने को मचल उठते हैं. जहाँ कभी चैनल वाले खोज-खोजकर उनके भाषण लगाने को आतुर रहा करते थे, बहुत से अभी भी हैं, वहीं अब जनता खुद ढूंढ-ढूंढकर चैनल बदलने में सुकून महसूस करती है. पिछले कुछ महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों की यात्राओं ने मुझे यह अनुभव करने पर मजबूर कर दिया है कि मोदीजी के भाषण अब पहले जैसे कानों में शहद नहीं, बल्कि नींद का सिरप घोलने का काम करने लगे हैं. तो क्या मोदी मैजिक कम होता जा रहा है? यदि हाँ तो वो कौन से कारण हैं जिन्हे पीएम मोदी के लोकप्रियता के ढ़लते ग्राफ का जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?
लोकप्रियता की इस गिरावट में कई कारक अपनी भूमिका निभा रहे हैं. पहला लोकसभा चुनाव 2024 में एनडीए ने 293 सीटें हासिल कीं. यह आंकड़ा सत्ता में बने रहने के लिए तो पर्याप्त था, लेकिन मोदी और उनके समर्थकों द्वारा गढ़े गए 'अबकी बार 400 पार' नारे से बहुत दूर था. इस नारे को लेकर पूरे देश में खूब प्रचार हुआ, मगर नतीजे जनता के भरोसे का अलग ही चित्र दिखा गए. यही कारण है कि यह नारा अब सत्ता के लिए उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है. जिसका जिक्र मैंने लोकसभा चुनाव से पूर्व लिखे अपने लेखों में भी लगातार किया है.
दूसरा विदेश नीति के मोर्चे पर भी मोदी सरकार को लगातार आलोचना झेलनी पड़ रही है. फिर बात ट्रंप और अमेरिका के साथ खराब होते दोस्ताना संबंधों की हो या पाकिस्तान के साथ युद्धविराम की सहमति की, यहाँ तक कि स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर अचानक दिया गया उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का इस्तीफ़ा भी इसी क्रम में गिना जा सकता है. कहना गलत नहीं होगा कि हाल की कुछ गतिविधियों ने मोदी सरकार की पारदर्शी व सख्त निर्णय लेने वाली छवि पर आंच डालने का काम किया है, साथ ही उनके समर्थकों को भी बराबर मात्रा में निराश किया है. फिर लम्बे समय से चले आ रहे ईडी, सीबीआई या चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को कंट्रोल करने के आरोप भी पीएम मोदी और उनकी सरकार से जनता के भरोसे को डगमगाने में सहायक भूमिका निभा रहे हैं.

डॉ अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)
Senior Technical Editor | Writer | Asst. Editor, Political, Geopolitical & Social Affairs
Working across digital media, technology, public discourse, and contemporary political developments.
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