“बिजली रानी” कविता में बिजली संकट पर व्यंग्यात्मक प्रहार
कविता में बिजली की कमी से आम लोगों की परेशानी का चित्रण
कवि अनिल गुड्डू की कविता “बिजली रानी” बिजली कटौती और उससे होने वाली आम लोगों की परेशानियों को व्यंग्यात्मक और भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत करती है।
चंचल, शर्मीली, कोमल, हठीली,
लाजवंती की है तू सहेली।
तुझे देखे बिना इस जग को,
मिलता नहीं पीने को पानी,
झलक दिखाकर कहाँ,
चली जाती हो बिजली रानी?

भूतों का यह घर लगता है।
दिन तो जैसे-तैसे कट जाता है,
रात में मच्छर शोर मचाता है।
बचपन तो डर-डर के बीत गया,
अब मुसीबत में है जवानी,
झलक दिखाकर कहाँ,
चली जाती हो बिजली रानी?
तुमसे ही घर में सुख-शांति,
तुमसे ही घर में हो क्रांति।
हवन करें या जाप करें हम,
तुम किसी की बात न मानती।
कहाँ खोजें, किससे करें बातें,
तू है छुई-मुई सी दीवानी,
झलक दिखाकर कहाँ,
चली जाती हो बिजली रानी?
मेहमान अब कोई आता नहीं,
पड़ोसी भी हमें बुलाता नहीं।
सब महफिल में अकेले हो गए,
अपने ही दुखों में खो गए।
भगवान ही बचाए अब देश को,
गजब है तेरी यह कहानी,
झलक दिखाकर कहाँ,
चली जाती हो बिजली रानी!
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.
