Climate कहानी : सिर्फ धुआँ नहीं, मौसम भी बढ़ा रहा शहरों की हवा में ज़हर
क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिपोर्ट में वायु प्रदूषण पर बड़ा खुलासा
भारत के बड़े शहरों में बढ़ते वायु प्रदूषण को अक्सर वाहनों, उद्योगों और कचरा जलाने जैसे कारणों से जोड़ा जाता है, लेकिन एक नई रिपोर्ट बताती है कि मौसम भी इसमें बड़ी भूमिका निभाता है। पर्यावरण संस्था Climate Trends की स्टडी के अनुसार मौसम की स्थितियां प्रदूषण के स्तर को 40 प्रतिशत तक प्रभावित कर सकती हैं।
भारत के बड़े शहरों में बढ़ते प्रदूषण को अक्सर सिर्फ उत्सर्जन का नतीजा माना जाता है। गाड़ियों का धुआँ, उद्योगों का धुआँ, कूड़ा जलाना। मगर एक नई स्टडी बताती है कि कहानी इससे कहीं ज़्यादा जटिल है।

पर्यावरण शोध संस्था Climate Trends की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, मौसम की स्थितियाँ अपने आप में प्रदूषण के स्तर को 40 प्रतिशत तक ऊपर-नीचे कर सकती हैं, भले ही उत्सर्जन में कोई बदलाव न हुआ हो। यह विश्लेषण 2024 से 2025 के बीच केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के वायु गुणवत्ता आंकड़ों के आधार पर किया गया है।
रिपोर्ट बताती है कि भारत के कई शहरों में प्रदूषण का असली संकट उत्सर्जन और मौसम के आपसी मेल से बनता है। खासकर तब, जब हवा की रफ्तार बेहद कम होती है और नमी अधिक होती है। ऐसी स्थिति में वातावरण में ठहराव पैदा हो जाता है, जिससे प्रदूषक कण शहर के ऊपर ही जमा होने लगते हैं।
दिल्ली में सर्दियों की घुटन
अध्ययन के मुताबिक दिल्ली देश का सबसे गंभीर वायु प्रदूषण संकट झेलने वाला शहर बना हुआ है। यहां सालाना औसत PM2.5 स्तर सबसे अधिक दर्ज किए गए हैं।
सर्दियों में हालात और भी खराब हो जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार सर्दियों के दौरान दिल्ली में एक भी “क्लीन एयर डे” दर्ज नहीं हुआ। यही वजह है कि साल भर के औसत आंकड़े कभी-कभी सुधार दिखाते हैं, लेकिन नागरिकों को असली राहत महसूस नहीं होती।
रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली और पटना जैसे शहरों में सर्दियों के दौरान 70 प्रतिशत से अधिक दिनों में कम हवा और ज्यादा नमी वाली मौसम स्थितियाँ बनती हैं। यही ठहराव प्रदूषण को लंबे समय तक हवा में बनाए रखता है।
Climate Trends की संस्थापक और निदेशक आरती खोसला कहती हैं कि “अगर सालाना PM2.5 में 20 से 30 प्रतिशत की कमी भी आती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि सर्दियों में हवा सुरक्षित हो गई है। दिल्ली और पटना जैसे शहरों में मौसम की वजह से प्रदूषण लंबे समय तक जमा रहता है। इसलिए आने वाले एनकैप चरण में मौसम को ध्यान में रखकर लक्ष्य तय करना जरूरी है।”
पटना की गहराती समस्या
अध्ययन में यह भी सामने आया कि पटना देश का दूसरा सबसे प्रदूषित शहर बन चुका है। यहां भी प्रदूषण का स्तर लगातार ऊंचा बना रहता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, गंगा के मैदानों में स्थित कई शहरों में हवा का प्रवाह सीमित होता है। ऐसे में प्रदूषण फैलने के बजाय शहर के ऊपर ही अटक जाता है।
दक्षिण के शहरों में नया खतरा
रिपोर्ट एक और दिलचस्प बदलाव की ओर इशारा करती है। परंपरागत रूप से अपेक्षाकृत साफ माने जाने वाले बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों में भी अब सर्दियों के महीनों में हवा की गुणवत्ता बिगड़ने के संकेत मिलने लगे हैं। यह एक नया ट्रेंड माना जा रहा है।
इसके अलावा मुंबई और चेन्नई में 2025 के दौरान सालाना औसत प्रदूषण स्तर में बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो इस बात का संकेत है कि प्रदूषण अब सिर्फ कुछ महीनों की समस्या नहीं रह गया है।
दिलचस्प बात यह है कि बड़े शहरों में बेंगलुरु अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में दिखाई देता है। रिपोर्ट के अनुसार वहां हवा की गुणवत्ता अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई है, जिसे शोधकर्ता “संरचनात्मक वायु गुणवत्ता सहनशीलता” कहते हैं।
कोलकाता की सर्द हवा
कोलकाता में भी प्रदूषण का संकट सर्दियों में सबसे ज्यादा गंभीर हो जाता है। आईआईटी दिल्ली के सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंसेज़ के प्रमुख साग्निक डे बताते हैं कि उत्तर भारत के कई शहरों में 1 मीटर प्रति सेकंड से भी कम हवा की गति और अधिक नमी के कारण प्रदूषण लंबे समय तक बना रहता है। ऐसे हालात में वेंटिलेशन यानी हवा के फैलाव की क्षमता प्रदूषण स्तर तय करने में बड़ी भूमिका निभाती है।
आईआईएसईआर कोलकाता के पृथ्वी विज्ञान विभाग के डॉ. अभिनंदन घोष कहते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक और मौसमीय परिस्थितियाँ पश्चिमी देशों से अलग हैं। इसलिए यहां प्रदूषण को समझने और उससे निपटने की रणनीति भी अलग होनी चाहिए।
वहीं बोस इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर अभिजीत चटर्जी के मुताबिक कोलकाता में सर्दियों के दौरान बायोमास और कचरा जलाना प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं। कम हवा की वजह से ये कण जमीन के पास ही जमा हो जाते हैं।
नई रणनीति की जरूरत
रिपोर्ट का निष्कर्ष साफ है। अगर भारत को वाकई साफ हवा चाहिए, तो सिर्फ उत्सर्जन घटाने की नीतियाँ पर्याप्त नहीं होंगी। इसके लिए मौसम आधारित रणनीति भी जरूरी होगी।
रिपोर्ट सुझाव देती है कि राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के अगले चरण में सर्दियों के लिए अलग लक्ष्य, मौसम के हिसाब से प्रदूषण मापने के तरीके, और मौसम बदलते ही सक्रिय होने वाली कार्रवाई योजनाएँ बनाई जाएँ।
क्योंकि कई बार हवा को साफ करने के लिए सिर्फ प्रदूषण कम करना ही नहीं, उसे फैलने की जगह भी देनी पड़ती है और भारत के शहरों में, यह जगह अक्सर मौसम ही तय करता है।
