90 के दशक के सहपाठी जुटे  तिलैया डैम के तट पर, मनोरम वादियों में भावनाओं का दिखा सैलाब  

मुंबई, जयपुर, भीलवाड़ा, रांची और दरभंगा से पहुंचे सहपाठी 

90 के दशक के सहपाठी जुटे  तिलैया डैम के तट पर, मनोरम वादियों में भावनाओं का दिखा सैलाब  

इस ग्रुप के दोस्तों ने तिलैया डैम में एक सामूहिक भोज का आयोजन किया, जिसमें इस ग्रुप के सदस्य केवल झुमरीतिलैया ही नहीं, अपितु झारखंड के विभिन्न जगहों सहित देश के अन्य राज्यों से भी दोस्तों ने आकर अपनी 34 साल पुरानी यादें साझा कीं।

कोडरमा: विश्व ख्यातिप्राप्त शहर झुमरी तिलैया के 90 के दशक के तकरीबन 92 सहपाठी अभी भी अपने जेहन में पुरानी यादों और दोस्ती के जज्बे को संभाल रखा है। सभी एक दूसरे के सुख दुख में आज भी शरीक होते हैं। इसी भाव से ये सभी 14 जनवरी को तिलैया डैम की मनोरम वादियों में जुटे और खुशियां बांटी। 

लोग 90 के दशक की पुरानी मधुर स्मृतियों में खोए हुए थे। स्कूल लाइफ के इर्द- गिर्द यादें ताजा और साझा की जा रही थी। लोग उस बचपन, उस लड़कपन की उन सुनहरी यादों में खो से गए थे, जो निःश्छल, बेफिक्र, नील गगन में उड़ते आजाद परिंदे के जीवन की तरह थे। ऐसी अनुभूति थी कि वक्त थम सा गया था और वाल्टन के वे प्यारे दिन लौट आए हों। 

मित्रता बड़ा अनमोल रत्न, कब तौल सका इसको धन सभी इसे चरितार्थ किया । कहते हैं बचपन की दोस्ती जीवनभर याद रहती है। समय चक्र चलता रहता है पर बचपन की दोस्ती एक साए की तरह रहती है। ताउम्र न मिटने वाली यादें। 
  

दोस्तों के दिलों में जिंदा है। जब किसी दोस्त ने कभी भी आवाज दी, किसी के साथ मुसीबत आयी, इस 92 लायन के दोस्तों ने अपना दुःख- दुःख समझा और बिना किसी स्वार्थ के वहां पहुंच गया। इतना ही नहीं दोस्तों के परिवार और बच्चों को अपना परिवार समझा। हर खुशी और गम में शामिल होते हैं।  

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इस ग्रुप के दोस्तों ने तिलैया डैम में एक सामूहिक भोज का आयोजन किया, जिसमें इस ग्रुप के सदस्य केवल झुमरीतिलैया ही नहीं, अपितु झारखंड के विभिन्न जगहों सहित देश के अन्य राज्यों से भी दोस्तों ने आकर अपनी 34 साल पुरानी यादें साझा कीं। इस ग्रुप में शहर के बिजनेसमैन, डॉक्टर, इंजीनियर सहित प्रशासनिक अधिकारी भी हैं।

इस ग्रुप के मुरली मोदी, धीरेन्द्र सिन्हा, अमर वर्मा संतोष कुमार, नवीन तरवे, संतोष पहाड़ी, दिलीप वर्मा, रूपेश कुमार, पंकज भगत, सुनीत दारुका, विकास भदानी, राजा वर्मा, मुकेश लोहनी, बंटी जगनानी, अभिषेक भदानी, मनीष कंधवे, अरुण लाल, अजय शर्मा, पंकज तरवे, राजू साव, सुदर्शन, संतोष गोस्वामी, आकाश दीप हिसारिया, राजू (राजेश), लक्ष्मी नारायण, शत्रुंजय कुमार, रीतेश दुग्गड़, राकेश कुमार, कुलजीत सिंह, शेखर, राजीव मुटनेजा, प्रमोद कुमार आदि ने वर्षों पुरानी स्मृतियों को ताजा कर भावुक हो उठे। 


कार्यक्रम में लक्ष्मी नारायण की बांसुरी की धुन ने दोस्तों के दिलों में एक अमित छाप छोड़ दी। चलते- चलते यह जज्बा सहज दृष्टिगत हुआ कि दोस्ती एक जज्बा है, इंसां के अरमानों की।

दोस्ती मजहब न देखें दोस्ती मतलब न देखें, तलबगार है दोस्ती, जो बुझती नहीं दीवानों की।

Edited By: Samridh Jharkhand

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