Mahashivratri special 2026 : तांडव की लय और मांदर की थाप
परंपरा, प्रकृति और संगीत का जीवंत संगम
यह लेख मांदर की थाप और शिव तांडव के माध्यम से आदिवासी संस्कृति, प्रकृति और जीवन की लय के बीच के संबंध को दर्शाता है। इसमें बताया गया है कि नृत्य और संगीत केवल कला नहीं, बल्कि जीवन की गति और सामूहिक चेतना का उत्सव हैं। लेख मनुष्य और प्रकृति के बीच के प्राचीन संबंध को पुनः समझने का संदेश देता है।
रात जब गहराती है और जंगल की निस्तब्धता अपने भीतर किसी अनसुनी धड़कन को सँजोने लगती है, तब कहीं दूर से मांदर की थाप सुनाई देती है। वह थाप केवल एक वाद्य की ध्वनि नहीं होती; वह धरती की नाड़ी है, जो मनुष्य के कदमों से मिलकर जीवन की लय रचती है। इसी लय में शिव का तांडव भी कहीं न कहीं जीवित है—आदिम, अनगढ़ और अनंत।

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मांदर की थाप सरल होती है, पर उसमें एक गहरी शक्ति छिपी होती है। वह थाप जैसे ही गूँजती है, लोग एक वृत्त में इकट्ठा हो जाते हैं। कदम ताल मिलाते हैं, हाथ एक-दूसरे से जुड़ते हैं, और नृत्य शुरू हो जाता है। यह नृत्य किसी मंच के लिए नहीं, जीवन के लिए होता है। इसमें कोई दर्शक नहीं, सब सहभागी होते हैं।
शिव का तांडव भी ऐसा ही है—जहाँ देवता और जगत के बीच कोई दूरी नहीं रहती। डमरू की ध्वनि और मांदर की थाप जैसे एक ही लय के दो रूप प्रतीत होते हैं।
आदिवासी समाज में नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना का उत्सव है। फसल कटने पर, पर्व आने पर, या शिवरात्रि जैसी रात्रि में मांदर की थाप पर लोग नाचते हैं। यह नृत्य धरती के प्रति कृतज्ञता का भी है और जीवन की निरंतरता का भी। जब मांदर की आवाज़ जंगल में गूँजती है, तो लगता है जैसे धरती स्वयं तांडव कर रही हो।
शिव का तांडव भी इसी धरती की गति है—पर्वतों का उठना-गिरना, नदियों का बहना, ऋतुओं का बदलना। यह नृत्य हमें याद दिलाता है कि जीवन स्थिर नहीं, निरंतर प्रवाहमान है।
तांडव की कल्पना में अग्नि है, ऊर्जा है, और परिवर्तन का साहस है। मांदर की थाप में भी वही ऊर्जा छिपी है। जब युवा और वृद्ध, स्त्री और पुरुष एक साथ नृत्य करते हैं, तो वहाँ कोई भेद नहीं रहता। सब एक लय में बँध जाते हैं। यह लय ही समाज को जोड़ती है, जैसे तांडव सृष्टि को जोड़ता है।
शिव के नटराज रूप में जो वृत्ताकार नृत्य है, वही वृत्त आदिवासी नृत्य में भी दिखाई देता है—जहाँ सब एक घेरे में घूमते हैं। यह घेरा केवल नृत्य का नहीं, एकता का प्रतीक है।
मांदर की थाप में एक आदिम स्मृति भी छिपी होती है। यह वही ध्वनि है, जो शायद मानव सभ्यता के प्रारंभ में पहली बार गूँजी होगी—जब मनुष्य ने लकड़ी या चमड़े पर प्रहार करके लय बनाई होगी। उसी लय से नृत्य जन्मा होगा, और उसी नृत्य से देवता की कल्पना। शिव का तांडव शायद उसी पहली लय का विस्तार है।
इसलिए जब मांदर बजता है, तो वह केवल वर्तमान का संगीत नहीं, बल्कि इतिहास की धड़कन भी होता है।
आज के आधुनिक जीवन में जब संगीत कृत्रिम हो गया है और नृत्य मंचों तक सीमित हो गया है, तब भी आदिवासी समाज मांदर की थाप को जीवित रखे हुए है। यह थाप हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है। वह याद दिलाती है कि मनुष्य और प्रकृति के बीच जो लय है, वही
जीवन का आधार है।
शिव का तांडव भी यही सिखाता है—कि सृष्टि का हर परिवर्तन एक नृत्य है, हर विनाश एक नई सृष्टि की भूमिका है।
तांडव की लय और मांदर की थाप हमें एक गहरे सत्य तक ले जाती है—कि जीवन का सार गति में है। जब तक लय है, तब तक जीवन है। जब मांदर की थाप रुकती है, तो नृत्य थम जाता है; जब तांडव रुकता है, तो सृष्टि भी ठहर जाती है।
इसलिए मांदर की हर थाप में शिव का तांडव छिपा है, और हर तांडव में जीवन की अनंत धड़कन।
शायद इसी कारण जंगल की रात में गूँजती मांदर की आवाज़ सुनकर लगता है कि कहीं दूर शिव नृत्य कर रहे हैं—अनंत, निर्भीक और मुक्त और उस नृत्य में मनुष्य भी शामिल है, धरती भी, आकाश भी। यही तांडव की लय है, यही मांदर की थाप—जीवन का शाश्वत उत्सव।
डॉ आशुतोष प्रसाद
साहित्यकार
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.
