“मायके की यादें”: मां के बिना सूना घर और भावनाओं का सैलाब
मां के जाने के बाद मायके का बदलता एहसास
“मायके की यादें” एक भावनात्मक लघुकथा है, जो मां के जाने के बाद मायके लौटने वाली बेटी की संवेदनाओं को दर्शाती है। सूने आंगन, बंद कमरों और बचपन की यादों के बीच वह मां के स्नेह और दुलार को महसूस करती है।
माँ के जाने के बाद दो वर्ष बीत गए थे मायके का घर देखे हुए, उस दलहीज पर पैर रखते ही मुस्कुराते हुए। आज गृहस्थी से फुरसत निकालकर उस बंद घर को उसके हर कमरे को खोलती जाती हूँ और यादों के समुन्दर में डूबती जाती हूँ। मायके के सूने आंगन को देखकर यादों के पुलिंदे तह दर तह खोलती जाती हूँ।

आँचल में तमाम लम्हों को समेटकर अंतिम दरवाजा बंद करती हूँ। गालों पर ढलके आंसुओं को पोंछकर मुड़कर घर के चौखट को देखती हूँ। चौखट पर एक परछाई सी दिखती है, एक उम्मीद सी जगती है, शायद माँ मुझे पुकार लेगी, मेरे बहते हुए आंसुओं को पोंछते हुए कहेगी बेटी फिर आना, मायके को भूल न जाना।
लेखिका: रश्मि सिन्हा
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.
