अमेरिका-इज़रायल के हमले से वैश्विक अर्थव्यवस्था संकट में, महंगाई का खतरा

लगातार युद्धों से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव

अमेरिका-इज़रायल के हमले से वैश्विक अर्थव्यवस्था संकट में, महंगाई का खतरा
युद्ध की तस्वीर

अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किए गए हमले ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को संकट में डाल दिया है। तेल और गैस की कीमतों में अस्थिरता के कारण महंगाई बढ़ने का खतरा है। भारत में एलपीजी आपूर्ति और ईंधन कीमतों पर इसका असर देखा जा रहा है।

निर्मल महाराज की कलम से 

कोरोना महामारी से लेकर अब तक पिछले छह साल में दुनिया एक के बाद एक नया संकट झेलती आ रही है। वर्ष 2020-21 के बाद दुनिया कोरोना महामारी की मार से उबर ही रही थी कि फरवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया। चार साल हो चुके हैं अभी तक यह लड़ाई चल रही है। जानमाल का भारी नुकसान हो चुका है लेकिन इसके थमने की कोई सूरत नहीं दिख रही। यूरोप और एशियाई देश इस युद्ध से उत्पन्न स्थिति से अपने आप को संभालने में लगे हुये थे कि अक्टूबर 2023 में इजरायल और हमास के बीच युद्ध छिड़ गया। यह लड़ाई भी डेढ साल चली।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई में बीच बचाव से यह संघर्ष किसी तरह बंद हुआ लेकिन क्षेत्र में तनाव बना रहा। तब ऐसा लगा कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वास्तव में दुनिया में शांति स्थापना में लगे हैं। उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध रोकने के लिये भी प्रयास किया, दोनों देशों के प्रमुखों से मिले बातचीत की समझौते का प्रस्ताव भी रखा। पिछले साल मई में भारत-पाकिस्तान के बीच हुये चार दिन के टकराव को लेकर भी वह लगातार दावा करते रहे कि उन्होंने ही इस लड़ाई को रूकवाया, हालांकि भारत सरकार ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया।

बहरहाल, जैसे तैसे स्थिति सभंल रही थी कि डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल के साथ मिलकर 28 फरवरी को ईरान पर हमला कर दिया। यह युद्ध अब चौथे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है और इसने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दुनिया में शांति स्थापित करने वाले नेता की छवि को कहीं पीछे छोड़ दिया है।जनवरी 2025 में अमेरिका का राष्ट्रपति पद संभालने के बाद से डोनाल्ड ट्रंप लगातार खबरों में रहे हैं। उनके फैसलों से पूरी दुनिया अस्थिरता के झंझावत में फंसती चली गई।

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‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ के नारे के साथ अमेरिका की सत्ता हासिल करने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने देखते ही देखते दुनिया के विभिन्न देशों के साथ टैरिफ युद्ध शुरू कर दिया। पूरी दुनिया के बाजार अस्थिर हो गये। भारत, चीन सहित तमाम यूरोपीय देश अमेरिकी टैरिफ की उठापटक से हैरान-परेशान रहे। यहां तक कि अमेरिका के लोग भी इस स्थिति से संतुष्ट नहीं थे और यही वजह है कि मामला अदालत पहुंचा और अंततः अमेरिका के उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा जहां फैसला ट्रंप टैरिफ के खिलाफ आया।

इस फैसले के बाद दुनिया के देश कुछ राहत महसूस करते और चीजें शांत होती अमेरिका-इजरायल के ईरान पर हमले से स्थिति और बिगड़ गई। तेल, गैस के दाम चढ़ने से पूरी दुनिया पर महंगाई बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है। महंगाई बढ़ने से ब्याज दरें उंची होंगी जिसका आर्थिक वृद्धि पर असर पड़ेगा। दुनिया में आर्थिक सुस्ती बढ़ेगी। इस लड़ाई को शुरू हुये अब एक महीना होने को है। चीजें ठीक होने के बजाय और उलझती जा रही हैं।

अमेरिका के राष्ट्रपति हर दिन अलग अलग तरह की बातें करते हैं। कभी कहते हैं कि वह लड़ाई को लंबा खींचने के पक्ष में नहीं है तो कभी ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दे देते हैं। धमकी को 24 घंटे भी नहीं होते कि यह कहकर सबको चैंका देते हैं कि ईरान के साथ अच्छी बातचीत हुई है इसलिये ईरान को जो चेतावनी दी गई उसे पांच दिन के लिये टाल दिया जाता है। उनके इस बयान के बाद दुनिया भर के बाजारों में एक बार फिर उठापटक शुरू हो गई। तेल के दाम नीचे आ गये।

वहीं ईरान ने अमेरिका के साथ किसी भी तरह की बातचीत से इनकार किया तो अनिश्चितता बढ़ गई। ईरान का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति तेल बाजार को प्रभावित करने के लिये इस तरह के वक्तव्य दे रहे हैं। ईरान के सैन्य दबाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के विभिन्न देशों को होने वाले कच्चा तेल और गैस निर्यात में बड़ी समस्या उत्पन्न हो रही है। इसके कारण भारत में एलपीजी आपूर्ति प्रभावित हुई है।

भारत अपनी कुल एलपीजी खपत का 60 प्रतिशत आयात करता है और उसमें से 90 प्रतिशत आयात खाड़ी क्षेत्र के देशों से होता आया है। पेट्रोल, डीजल के मामले में तो स्थिति फिलहाल नियंत्रण में दिख रही है लेकिन घरेलू एलपीजी सिलेंडर को लेकर लोगों में घबराहट है। गैस वितरक एजेंसियों के गोदामों के बाहर सिलेंडर लेकर लंबी लंबी कतारें देखी जा रही हैं। देश में जिन वस्तुओं का बड़े पैमाने पर आयात होता है डालर के मुकाबले रूपया गिरने से उनके दाम पर दबाव बढ़ने लगा है। देश में कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, उर्वरक, खाद्य तेल और दालों का बड़े पैमाने पर आयात होता है। दवाईयों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल में कई चीजें पेट्रोकेमिकल से जुड़ी हैं। विश्व बाजार में कच्चे तेल के दाम 100 से 120 डालर प्रति बैरल के बीच कभी नीचे आते हैं तो कभी चढ़ जाते हैं। कच्चा तेल महंगा आयेगा तो पेट्रोकेमिकल्स की भी लागत बढे़गी।

प्लास्टिक से बनने वाली तमाम चीजों पर इस स्थिति का असर होगा। जब से यह लड़ाई शुरू हुई है डालर के मुकाबले रूपया गिरता हुआ 94 रूपये प्रति डालर तक नीचे जा चुका है। शेयर बाजारों में विदेशी संस्थानों की लगातार बिकवाली जारी है। अकेले मार्च माह में ही विदेशी संस्थानों ने 88,000 करोड़ रूपये से अधिक की बिकवाली कर डाली। बीएसई सेंसेक्स जो कि एक समय 86,000 अंक से उपर पहुंच चुका था इन दिनों 72 से 74,000 अंक के बीच आ चुका है। यही हाल निफ्टी का है, 26,000 अंक से लुढ़कता हुआ यह 22,000 के आसपास आ गया है। अस्थिरता के इस दौर में निवेश की सुरक्षित पनाहगाह माना जाने वाला सोना, चांदी भी इन दिनों महंगाई, ब्याज दरें बढ़ने की आशंका में लगातार घटते जा रहे हैं। एमसीएक्स में सोने का वायदा भाव पिछले दिन के मुकाबले 5.6 प्रतिशत घट गया वहीं चांदी 11 प्रतिशत की बड़ी गिरावट के साथ 2.03 लाख रूपये प्रति किलो रह गई।

मंगलवार को दिल्ली में 22 कैरेट सोने का भाव सवा लाख रूपये प्रति 10 ग्राम और चांदी का भाव 2.30 लाख रूपये प्रति किलो बताया गया। युद्ध शुरू होने से पहले सोना डेढ़ लाख रूपये प्रति 10 ग्राम और चांदी का भाव तीन लाख रूपये किलो से उपर पहुंच गया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस संकट से निपटने के लिये देशवासियों से कोरोना काल जैसी एकजुटता और संकल्प दिखाने को कहा है। उन्होंने कहा है कि कुछ तत्व परिस्थिति का लाभ उठाने का प्रयास करेंगे लेकिन हमें सतर्क रहना होगा, जमाखोरी और कालाबाजारी को रोकना होगा। सरकार का पूरा प्रयास है कि मौजूदा कठिन परिस्थिति में भी देश के सामान्य से सामान्य परिवार को कम से कम परेशानी हो।

Edited By: Mohit Sinha
Mohit Sinha Picture

Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.

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