Hazaribagh News: हर्षोल्लास के साथ मनाया गया सरहुल पर्व, प्रकृति पूजा और परंपराओं की दिखी अनूठी झलक
सफेद-लाल साड़ियों और पारंपरिक वेशभूषा में सजे श्रद्धालु, सरहुल शोभायात्रा में दिखी अद्भुत झलक
हजारीबाग जिले में प्रकृति पर्व सरहुल पूरे पारंपरिक हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। उत्सव की शुरुआत धूमकुड़िया में जिला पाहन बंधन टोप्पो द्वारा सखुआ वृक्ष की पूजा-अर्चना के साथ हुई। इसके बाद सरना समिति के केंद्रीय अध्यक्ष महेंद्र बैक के नेतृत्व में शहर के विभिन्न हिस्सों से भव्य शोभायात्रा निकाली गई। ढोल-नगाड़ों और मांदर की थाप पर पारंपरिक वेशभूषा में सजे लोग झूमते-गाते सरहुल मैदान पहुँचे। इस दौरान पूरे शहर में उत्सव का माहौल रहा और सामाजिक संगठनों ने पुष्प वर्षा कर जुलूस का स्वागत किया।
हजारीबाग: आदिवासी समाज के प्रकृति प्रेम, आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक पर्व सरहुल पूरे हर्षोल्लास और धूमधाम के साथ मनाया गया। इस अवसर पर शहर का माहौल पारंपरिक गीत-संगीत, ढोल-नगाड़ों की गूंज और रंग-बिरंगी सांस्कृतिक झलकियों से जीवंत हो उठा। इस आयोजन में सरना समिति के केंद्रीय अध्यक्ष महेंद्र बैक, संरक्षक बंधन एक्का, कोषाध्यक्ष जीतवाहन भगत, संरक्षक महेश तिर्की, कृपाल कच्छप, अंकेक्षक महेंद्र कुजूर, रमेश हेम्ब्रम, परमेश्वर ओरांव, सचिव सुनील लकड़ा, रामनारायण महतो, पूरण मुंडा, उपाध्यक्ष फुलवा कच्छप, पवन तिग्गा एवं बिरसा मुंडा सहित सैकड़ों लोग शामिल हुए। सभी ने एकजुट होकर इस पारंपरिक पर्व को पूरे उत्साह के साथ मनाया।पर्व की शुरुआत धूमकुड़िया हजारीबाग में जिला पाहन बंधन टोप्पो द्वारा विधि-विधान से पूजा-अर्चना के साथ हुई।
इस दौरान प्रकृति और विशेष रूप से सखुआ (साल) वृक्ष की पूजा की गई। सरहुल पर्व में सखुआ के फूलों को अत्यंत पवित्र माना जाता है और इन्हीं के माध्यम से प्रकृति के प्रति आभार प्रकट किया जाता है। पाहन ने बताया कि सरहुल पर्व आदिवासी समाज के प्रकृति के साथ गहरे संबंध का प्रतीक है। इस दिन जल, जंगल और जमीन की रक्षा का संकल्प लिया जाता है, जो समाज की जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पूजा के बाद शहर के विभिन्न क्षेत्रों से अखाड़ा दलों द्वारा भव्य शोभायात्रा निकाली गई। ढोल, नगाड़ों और मांदर की थाप पर लोग पारंपरिक नृत्य करते हुए पूरे शहर में भ्रमण करते नजर आए। इस दौरान आदिवासी परंपरा के साथ-साथ पारंपरिक पहनावे की भी आकर्षक झलक देखने को मिली।

अंत में सभी जुलूस सरहुल मैदान में एकत्रित हुए, जहां सभा का आयोजन किया गया। इस दौरान समाज के वरिष्ठजनों ने अपने संबोधन में सरहुल पर्व के महत्व और प्रकृति संरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का समापन पारंपरिक रीति-रिवाजों और आपसी भाईचारे के साथ हुआ। सभी ने एक-दूसरे को बधाई देते हुए इस पर्व को मिलजुल कर मनाया।सरहुल पर्व ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि प्रकृति ही जीवन का आधार है। आदिवासी समाज का यह पर्व न केवल उनकी आस्था का प्रतीक है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, सांस्कृतिक एकता और परंपराओं को सहेजने की प्रेरणा भी देता है।
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