कोरोना के बारे में कुछ चिंतनीय पहलु पर केएन गोविंदाचार्य के विचार पढें
आजकल कोरोना के जन्मस्थान को लेकर भारी विवाद है. रूस, चीन, अमेरिका के ऊपर उँगलियाँ उठ रही हैं. कोई प्रकृतिजन्य मान रहा है तो कोई मानव का कारस्तानी मान रहा है. इस विवाद के विस्फोट ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को भी हिलाकर रख दिया है.
विश्व की आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था को कोरोना के कारण भारी नुकसान और तनाव झेलना पड़ रहा है.


इतना शायद जरूर है कि 25 बड़े शहरों में ज्यादा हैं और को-मोर्बिडिटी का भी योगदान रहता है. तमिलनाडू में डायबेटिस ज्यादा है. गुजरात मे हाई प्रेशर, ब्लड प्रेशर, हाइपरटेंशन, गरिष्ठ भोजन आदि शहरों मे ज्यादा है. पश्चिमी दुनिया के साथ ज्यादा संपर्क गुजरात के लोगों का रहा है. उसका कुछ असर खानपान, रहन-सहन पर भी पड़ा होगा.
कोरोना के बारे मे भुगत रहे हैं सभी लोग यह तो सच है. आर्थिक विषमता की मार अलग से है. भारत के प्रवासी मजदूर और असंगठित क्षेत्र के स्वरोजगारियों, छोटे व्यापारी विशेष परेशान है. तात्कालिक रूप से भी वे सामान्य जीवनयापन के लिए परेशान है. भारत के लगभग 140 करोड़ में 30 करोड़ 10 हजार रुपये माहवारी कमाई से ऊपर वाले होंगे. शेष 100 करोड़ तो रोजमर्रा की जिन्दगी की जरूरतों को पूरा करने के लिए जूझ रहे हैं. अब तो प्रवासी मजदूर में से लगभग 70 प्रतिशत वापस आये होंगे. अब वे क्या करें, प्रवासी बनकर गये ही इसलिये थे कि गाँव मे ईमान की रोटी और इज्जत की जिन्दगी मिलना कठिन था.
वापस आने पर एक सप्ताह मानसिक राहत रहेगी. उसके बाद तो जीविका खोजना है. आगे सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक समस्याएँ तो टकरायेगी ही. उनका तात्कालिक, मध्यकालिक और दीर्घकालिक समाधान खोजना होगा.
यह केवल भुक्तभोगियों की नहीं, हम सब देशवासियों की समस्या है. सभी लोग विचार विमर्श करें. यह प्रयास की पहली सीढ़ी होगी. तात्कालिक रूप से हर तरह की राहत चाहिए. मध्यकालिक स्तर पर ईमान की रोटी, इज्जत की जिन्दगी का जुगाड़ है और दीर्घकालिक रूप से प्रकृति केन्द्रिक विकास और विकेन्द्रित व्यवस्था के माध्यम से सुखी संतुष्ट जीवन मिले. इतना लक्ष्य तो समझ मे आता है, आगे की आप सब बतायें.


