Opinion: बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमला: वैश्विक चुप्पी और भारत के सामने कठोर सवाल

हिंदू युवक की हत्या पर अंतरराष्ट्रीय चुप्पी, भारत-विरोधी उन्माद बढ़ा

Opinion: बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमला: वैश्विक चुप्पी और भारत के सामने कठोर सवाल
अजय कुमार (फाइल फोटो)

बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले और अंतरराष्ट्रीय चुप्पी ने मानवाधिकारों की सच्चाई उजागर कर दी है। भारत के सामने अब निर्णायक कदम उठाने की जरूरत है।

दो दिन पहले तक दुनिया को इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने का उपदेश दिया जा रहा था। बड़े मंचों से भाषण हो रहे थे, मानवता और सभ्यता की दुहाई दी जा रही थी। लेकिन आज वही दुनिया बांग्लादेश में बहते हिंदुओं के खून पर खामोश है। वही ताकतें, जो खुद को मानवाधिकारों की सबसे बड़ी संरक्षक बताती हैं, आज ऐसी चुप्पी साधे बैठी हैं मानो कुछ हुआ ही न हो। बांग्लादेश में जो कुछ बीते दिनों हुआ, वह सिर्फ एक पड़ोसी देश की आंतरिक अशांति नहीं है, बल्कि यह उस सलेक्टिव सोच और वैचारिक पाखंड का आईना है, जिसे पूरी दुनिया को देखना चाहिए। बांग्लादेश में हालात उस वक्त बिगड़ने शुरू हुए, जब कट्टरपंथी नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद सड़कों पर उन्मादी भीड़ उतर आई। देखते ही देखते विरोध प्रदर्शन हिंसा में बदल गए। ढाका समेत कई शहरों में आगजनी, तोड़फोड़ और अराजकता फैल गई।

मीडिया संस्थानों को निशाना बनाया गया, सरकारी संपत्ति जलाई गई और भारत विरोधी नारे खुलेआम लगाए गए। यह सब कुछ अचानक नहीं हुआ, बल्कि लंबे समय से पनप रही कट्टर सोच का विस्फोट था।इस उन्माद की सबसे भयावह तस्वीर मैमनसिंह जिले से सामने आई। यहां एक हिंदू युवक दीपू चंद्र दास को भीड़ ने घेर लिया। पहले उसे बेरहमी से पीटा गया, फिर उसकी हत्या कर दी गई। यहीं तक भी दरिंदगी नहीं रुकी। युवक के शव को पेड़ से लटकाया गया और बीच सड़क पर लाकर आग लगा दी गई। यह घटना किसी एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी, बल्कि यह साफ संदेश था कि कट्टरपंथी भीड़ कानून, संविधान और इंसानियत से ऊपर खुद को मानने लगी है।इस बर्बरता के बाद सवाल उठना स्वाभाविक था कि दुनिया क्या बोलेगी। लेकिन यहां भी वही पुरानी कहानी दोहराई गई। पश्चिमी देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं आई।

न कोई तीखा बयान, न कोई सख्त चेतावनी। मानो एक हिंदू की हत्या कोई मायने ही नहीं रखती। इसके उलट जब ढाका में अखबारों के दफ्तर जले, तब प्रेस स्वतंत्रता की चिंता में बयान जारी होने लगे। यह फर्क साफ बताता है कि मानवाधिकारों की परिभाषा किसके लिए है और किसके लिए नहीं। ढाका में प्रथम आलो और द डेली स्टार जैसे बड़े अखबारों के दफ्तरों पर हमला हुआ। आगजनी और तोड़फोड़ की गई। इसके बाद पश्चिमी देशों के मीडिया संगठनों ने प्रेस नोट जारी कर चिंता जताई। यह चिंता अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन सवाल यह है कि उसी ढाका से कुछ ही दूरी पर जब एक हिंदू को जिंदा जला दिया गया, तब इनकी जुबान क्यों बंद हो गई। क्या इंसान की जान से ज्यादा इमारतें कीमती हैं।बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने जरूर इस हत्या की निंदा की और दोषियों पर कार्रवाई का भरोसा दिलाया। कुछ गिरफ्तारियां भी हुईं।

लेकिन सच्चाई यह है कि जमीन पर डर का माहौल कायम है। हिंदू समुदाय खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले, मंदिरों की तोड़फोड़ और जबरन पलायन की खबरें आती रही हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार हिंसा ने बेहद क्रूर रूप ले लिया। इस पूरी उथल-पुथल के बीच एक और तस्वीर सामने आई, जिसने भारत में आक्रोश को और बढ़ा दिया। बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने शरीफ उस्मान हादी को श्रद्धांजलि दी। वही हादी, जिसकी पहचान भारत विरोधी राजनीति से जुड़ी रही है। वही हादी, जिसका नाम ग्रेटर बांग्लादेश जैसे विवादित नक्शे से जुड़ा, जिसमें भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों को बांग्लादेश का हिस्सा दिखाया गया था। सवाल यह है कि जब बांग्लादेश की संस्थाएं खुलेआम भारत विरोधी सोच को सम्मान दे रही हैं, तो भारत को भी आंख बंद कर रिश्ते निभाने चाहिए या नहीं।

यही सवाल अब भारतीय क्रिकेट और आईपीएल तक पहुंच गया है। कोलकाता नाइट राइडर्स द्वारा बांग्लादेशी खिलाड़ी मुस्तफिजुर रहमान को करोड़ों रुपये में खरीदे जाने पर बहस तेज हो गई है। खेल भावना की दुहाई देने वाले कह रहे हैं कि खेल को राजनीति से अलग रखा जाना चाहिए। लेकिन जब खेल संस्थाएं ही राजनीतिक संदेश देने लगें, तब यह तर्क कमजोर पड़ जाता है। अतीत में मुस्तफिजुर के भारत विरोधी पोस्ट लाइक करने को लेकर विवाद हो चुका है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या भारत अपने ही खिलाफ जहर उगलने वालों पर पैसा और सम्मान लुटाए।

सोशल मीडिया पर आज यही बहस छाई हुई है। लोग पूछ रहे हैं कि जब बांग्लादेश की सड़कों पर भारत विरोधी नारे लग रहे हैं, हिंदुओं को मारा जा रहा है और भारत विरोधी सोच को महिमामंडित किया जा रहा है, तो बीसीसीआई और आईपीएल क्यों चुप हैं। क्या भारत प्रथम का विचार सिर्फ भाषणों तक सीमित रहेगा या फैसलों में भी दिखेगा।यह मुद्दा सिर्फ क्रिकेट या एक खिलाड़ी का नहीं है। यह राष्ट्रीय स्वाभिमान और सुरक्षा से जुड़ा सवाल है। पाकिस्तान के मामले में भारत ने साफ रुख अपनाया। खेल संबंध तोड़े गए, संदेश साफ दिया गया। अब जब बांग्लादेश में भी वही पाकिस्तान जैसी सोच उभरती दिख रही है, तो क्या भारत को अलग मापदंड अपनाने चाहिए।बांग्लादेश की सड़कों पर जो कुछ हो रहा है, वह पूरे क्षेत्र के लिए चेतावनी है।

कट्टरपंथ किसी एक धर्म या देश तक सीमित नहीं रहता। यह जहां भी पनपता है, वहां इंसानियत को कुचल देता है। आज निशाने पर हिंदू हैं, कल कोई और हो सकता है। यही कारण है कि इस वैचारिक आतंक के खिलाफ स्पष्ट और बिना दोहरे मापदंड के लड़ाई जरूरी है।दुनिया को यह समझना होगा कि इस्लामिक कट्टरपंथ सिर्फ यहूदियों या पश्चिमी देशों के लिए खतरा नहीं है। यह उतना ही बड़ा खतरा हिंदुओं और एशिया के देशों के लिए भी है। एक हिंदू की हत्या भी उतनी ही मानवता विरोधी है, जितनी किसी और की। जब तक यह बात स्वीकार नहीं की जाएगी, तब तक मानवाधिकार की बातें खोखली रहेंगी। भारत के सामने आज भावनाओं से नहीं, बल्कि सख्त नीति से काम लेने का वक्त है। दोस्ती उन्हीं से हो सकती है, जो दोस्ती की कद्र करें। जो भारत के खिलाफ सोचेंगे, भारत विरोधी उन्माद को बढ़ावा देंगे, उन्हें यह संदेश साफ मिलना चाहिए कि भारत अब चुप नहीं बैठेगा। यही समय की मांग है और यही भारत के हित में है।

अजय कुमार,                                
वरिष्ठ पत्रकार
लखनऊ ( उ. प्र.)
मो-9335566111

Edited By: Susmita Rani
Susmita Rani Picture

Susmita Rani is a journalist and content writer associated with Samridh Jharkhand. She regularly writes and reports on grassroots news from Jharkhand, covering social issues, agriculture, administration, public concerns, and daily horoscopes. Her writing focuses on factual accuracy, clarity, and public interest.

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