इतिहास नहीं, जनता को जवाब चाहिए; भाजपा के 12 साल का हिसाब चाहिए: विजय शंकर नायक
कांग्रेस प्रवक्ता ने रोजगार, महंगाई और किसानों की आय को लेकर सरकार को घेरा
झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमिटी के प्रदेश प्रवक्ता विजय शंकर नायक ने अपने लेख में भाजपा सरकार के 12 वर्षों के कार्यकाल पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने रोजगार, महंगाई, किसानों की आय, नोटबंदी, जीएसटी, कोविड प्रबंधन और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति जैसे मुद्दों को उठाते हुए सरकार से जवाब मांगा है।
सत्ता का मूल्यांकन नारों, विज्ञापनों और इवेंट मैनेजमेंट से नहीं, बल्कि जनता के जीवन में आए बदलावों से होता है। वर्ष 2014 में भाजपा ने देश की जनता से बड़े-बड़े वादे किए थे। भ्रष्टाचार मुक्त भारत, हर साल दो करोड़ रोजगार, किसानों की आय दोगुनी, महंगाई पर नियंत्रण, काला धन वापस लाकर हर खाते में 15 लाख रुपये, अच्छे दिन और विकास का नया मॉडल—इन वादों के सहारे भाजपा सत्ता में आई थी। आज 12 वर्ष बाद देश का नागरिक पूछ रहा है कि उन वादों का क्या हुआ?
भाजपा सरकार का सबसे बड़ा संकट यह है कि वह अपने 12 वर्षों का हिसाब देने के बजाय इतिहास बदलने और राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने में अधिक व्यस्त दिखाई देती है। नेहरू, इंदिरा गांधी और कांग्रेस की विरासत पर हमला भाजपा की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुका है, क्योंकि वर्तमान की विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए अतीत पर हमला करना सबसे आसान रास्ता है।

वादों का पहाड़, नतीजों का अकाल

किसानों से आय दोगुनी करने का वादा किया गया था। लेकिन किसानों को अपनी मांगों के लिए दिल्ली की सीमाओं पर महीनों आंदोलन करना पड़ा। तीन कृषि कानूनों को किसानों के हित में बताया गया, लेकिन जब लाखों किसान सड़कों पर उतर आए, तो सरकार को उन्हें वापस लेना पड़ा। यह भाजपा सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक पराजयों में से एक थी।
महंगाई पर नियंत्रण का दावा किया गया था। लेकिन रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल, खाद्य पदार्थ, दाल, तेल और रोजमर्रा की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने गरीब और मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी। आम आदमी की आय जितनी नहीं बढ़ी, उससे कहीं अधिक उसकी जिंदगी महंगी हो गई।
नोटबंदी : आर्थिक आपदा का अध्याय
नोटबंदी को काले धन, भ्रष्टाचार और आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कदम बताया गया था। लेकिन परिणाम क्या निकला?
लगभग पूरी नकदी बैंकिंग प्रणाली में वापस लौट आई। छोटे व्यापार चौपट हो गए। लाखों मजदूर बेरोजगार हुए। असंगठित क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ। अर्थव्यवस्था की रफ्तार प्रभावित हुई। देश की जनता ने घंटों लाइन में खड़े होकर कष्ट झेला, लेकिन वादे के अनुरूप परिणाम कभी सामने नहीं आए।
इतिहास नोटबंदी को आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि आर्थिक अव्यवस्था के रूप में याद रखेगा।
जीएसटी : एक राष्ट्र, अनेक परेशानियां
जीएसटी को ऐतिहासिक कर सुधार बताया गया था, लेकिन छोटे और मध्यम व्यापारियों के लिए यह जटिल अनुपालन और बढ़ती कागजी प्रक्रिया का प्रतीक बन गया। बड़े कॉरपोरेट समूहों के पास संसाधन थे, लेकिन छोटे दुकानदारों और लघु उद्योगों को इसका भारी बोझ उठाना पड़ा।
विकास या प्रचार?
भाजपा सरकार ने मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन जैसी परियोजनाओं का व्यापक प्रचार किया। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन योजनाओं ने उतने रोजगार पैदा किए, जितने वादे किए गए थे?
स्मार्ट सिटी परियोजनाएं अधूरी हैं। बुलेट ट्रेन अभी तक सपना बनी हुई है। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई। चीन पर निर्भरता कम करने के दावे भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके।
भाजपा शासन का मॉडल विकास से अधिक विज्ञापन-आधारित शासन का मॉडल बन गया, जहां उपलब्धि से ज्यादा उसका प्रचार महत्वपूर्ण हो गया।
कोविड काल की त्रासदी
कोविड महामारी के दौरान देश ने भयावह दृश्य देखे। लाखों प्रवासी मजदूर पैदल घर लौटने को मजबूर हुए। ऑक्सीजन की कमी, अस्पतालों में अव्यवस्था और स्वास्थ्य ढांचे की कमजोरियां उजागर हुईं। महामारी ने दिखा दिया कि चमकदार प्रचार और वास्तविक प्रशासनिक तैयारी में कितना अंतर हो सकता है।
लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ते सवाल
भाजपा सरकार पर सबसे गंभीर आरोप लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता को कमजोर करने का है। विपक्ष का आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ हथियार की तरह किया गया। संसद में बहस की परंपरा कमजोर हुई। मीडिया के एक बड़े हिस्से ने सत्ता से सवाल पूछने के बजाय उसका प्रचार करना अधिक उचित समझा।
लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है असहमति का सम्मान, संस्थाओं की स्वतंत्रता और सत्ता की जवाबदेही।
सामाजिक सौहार्द पर संकट
“सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” का नारा दिया गया था। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि पिछले वर्षों में समाज में ध्रुवीकरण बढ़ा है। बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक संकट जैसे मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए धार्मिक और सांप्रदायिक बहसों को लगातार राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया।
जब रोजगार का प्रश्न उठता है, तो धर्म की चर्चा शुरू हो जाती है। जब महंगाई पर सवाल उठता है, तो नया भावनात्मक मुद्दा सामने आ जाता है। यह लोकतांत्रिक विमर्श के लिए शुभ संकेत नहीं है।
अग्निपथ, पेपर लीक और युवाओं की निराशा
अग्निपथ योजना ने लाखों युवाओं के मन में भविष्य को लेकर असुरक्षा पैदा की। दूसरी ओर, विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं का विश्वास तोड़ा। एक ऐसा देश, जिसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है, वहां युवाओं का निराश होना सबसे बड़ी राष्ट्रीय चिंता का विषय होना चाहिए।
निष्कर्ष : इतिहास नहीं, हिसाब चाहिए
भाजपा के 12 वर्षों का मूल्यांकन करते समय देश को विज्ञापनों, नारों और राजनीतिक अभियानों से ऊपर उठकर वास्तविकताओं को देखना होगा। बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की परेशानी, नोटबंदी की विफलता, जीएसटी की जटिलता, कोविड की त्रासदी, सामाजिक ध्रुवीकरण, संस्थाओं पर सवाल और अधूरे वादे—ये सभी ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर जवाब मांगा जाना चाहिए।
जनता इतिहास बदलने की कोशिशों से प्रभावित नहीं होगी। जनता अपने जीवन की वास्तविकताओं के आधार पर फैसला करेगी।
देश पूछ रहा है—दो करोड़ नौकरियां कहां हैं?
किसानों की दोगुनी आय कहां है? 15 लाख रुपये कहां हैं? महंगाई पर नियंत्रण कहां है? भ्रष्टाचार मुक्त शासन कहां है? 12 साल बाद भी यदि इन सवालों का जवाब नहीं है, तो फिर यह कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि प्रचार रही है और सबसे बड़ी विफलता जनता की उम्मीदों को पूरा न कर पाना।
इतिहास पर कब्ज़ा नहीं, जनता को जवाब चाहिए।
भाजपा के 12 साल का हिसाब चाहिए।
अब देश में ऐसी राजनीति होनी चाहिए, जिससे रोजगार पैदा किया जा सके, महंगाई को कम किया जा सके, किसानों, छात्रों, युवाओं, महिलाओं, गरीब-गुरबा लोगों और खासकर दलित, आदिवासी, पिछड़ा, अल्पसंख्यक तथा मजदूर वर्ग को राहत मिल सके तथा संविधान व लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया जा सके।
अंततः लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है। प्रचार, छवि निर्माण और राजनीतिक नैरेटिव कितने भी मजबूत हों, जनता का अनुभव और जीवन की वास्तविकता ही किसी सरकार की असली परीक्षा तय करती है।
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.
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